चंचल पोर्ते, पी. एच. डी. स्कॉलर
श्री संजीव मलैया, सहा.प्राध्यापक
सस्य विज्ञान विभाग, इं.गा. कृ. वि.वि. रायपुर

आइये जानते हैं फसल कोदो के बारे में 
खाद्यान फसलों में कोदो (पेस्पेलम स्कोर्बिकुलेटम) भारत का एक प्राचीन अन्न है, जिसे ऋषि अन्न का दर्जा प्राप्त है। ऐसा माना जाता है कि, जब महर्षि विश्वामित्र सृष्टी की संरचना कर रहे थे तो सबसे पहले उन्होंने कोदो अन्न की उत्पत्ति की थी। यह अनाज औषधीय गुणों से परिपूर्ण है­, जिससे आधुनिक जीवनशैली के बीमारियों जैसे- मधुमेह, मोटापा, कोलेस्ट्रोल और उच्च रक्तचाप, थायरोइड, एनिमिया और 14 प्रकार के कैंसर इत्यादी इसके सेवन से नियंत्रित किये जा सकते हैं। कोदो के दानो में अनेक प्रकार के पोषक तत्त्व पाए जाते है, जो हमें अनेक प्रकार गंभीर बीमारियों से लड़ने में सहायता प्रदान करती है। इसमें 65.9 प्रतिशत कार्बोहायड्रेट, 1.4 प्रतिशत वसा की मात्रा पाई जाती है, साथ ही यह, जिंक, फाइबर, प्रोटीन, फोलिक एसिड, कैल्शियम, बी काम्प्लेक्स, एमिनो एसिड, विटामिन इ, कॉपर, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और पोटैशियम से भरपूर है।

इसकी खेती कैसे करें
कोदो एक ऐसी फसल है जिसे किसी भी तरह की भूमि में उगाना संभव है, जिन जगहों पर अन्य धान्य फसल उगाना नामुमकिन है, यह आसानी से उगाई जा सकती हैI इसे कम जलीय क्षेत्रों, अधिक उतार- चढ़ाव और उथली सतह पर खासकर उगाया जाता है। हल्की भूमि और अच्छी जल निकास वाले स्थानों को कोदो के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह गरीबों की फसल मानी जाती है, क्योंकि इसकी खेती अनउपजाऊ भूमियों में बगैर खाद पानी के भी की जा सकती हैI कोदो का पौधा धान के पौधे जैसा ही होता है, लेकिन खास बात यह है की इसकी खेती में धान से बहुत कम पानी की जरूरत होती है। कोदो के खेत को तैयार करने के लिए गर्मी के मौसम में एक जुताई एवं वर्षा ऋतु आने के बाद पुनः जुताई कर रोटावेटर चलाने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है तत्पश्चात कृषि कार्य आसानी से किये जा सकते हैं।

भूमि एवं बीज का चुनाव
सही एवं उन्नत बीज का चुनाव भूमि के अनुसार करना चाहिए। जिन क्षेत्रों की भूमि पथरीली, दोमट, माध्यम गहरी, कम उपजाऊ हो उन जगहों पर जल्दी पकने वाली किस्म तथा अधिक वर्षा वाली जगहों पर देर से पकने वाली किस्म को बोना चाहिए। इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा राज्य के लिए उपयुक्त कुछ उन्नत किस्म सुझाए गए हैं (तालिका-1)I कतार बोनी के लिए प्रति हेक्टेयर खेत में 8- 10 कि. ग्रा. बीज लगते हैं, तथा छिटकवा विधि से बोनी करने में 12- 15 कि. ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। ज्यादातर लघु धान्य फसलों की बुवाई छिटकवा विधि से ही की जाती है परन्तु, यदि कतारों में बुवाई की जाए तो निराई- गुड़ाई में आसानी होती है, तथा उत्पादन भी अच्छा प्राप्त होता है।

तालिका-1: इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर, छ.ग. से जारी की गयी कोदो की किस्में-

क्र.

किस्मों के नाम

अवधि (दिनों में)

सामान्य उपज क्षमता (क्विं /हे.)

विशिष्ट विशेषताएं

1

इंदिरा कोदो- 1

100- 106

22-25

स्मट एवं मक्खी (शूट फ्लाई) के लिए प्रतिरोधी

2

CG- कोदो- 2

95- 100

23-25

शीघ्र परिपक्वता, हलकी एवं उच्च भूमि हेतु उपयुक्त  

3

CG कोदो- 3

95- 100

28-32

मक्खी (शूट फ्लाई) के लिए शहनशील

4

जे. के. 41 

90- 100

18-20

पकने तक हरी रहती है

5

जे. के. 48

90- 105

20-22

हल्की भूमि हेतु उपयुक्त

6

जी. पी.यु.के.-3

90- 100

18-20

हल्की पथरीली भूमि हेतु उपयुक्त

















































स्त्रोत- न्यूटरी सीरियल्स मिल्लेट्स ऑफ़ छत्तीसगढ़ एवं कृषि दर्शिका 2023, इं. गा. कृ. वि.वि रायपुर छ.ग.

बुवाई का सही समय
वैसे तो बीजों की बुवाई का सही समय वर्षा ऋतु के प्रारंभ होने से ही हो जाता है, गौरतलब है कि, जल्दी बुवाई करने से अधिक उपज प्राप्त होती है, तथा कीट और रोग का प्रभाव भी कम देखने को मिलता है। अपितु इसके, यदि जुलाई महीने के अंत में कोदो की बोनी की जाए तो फसल में तना मक्खी कीट (शूट फ्लाई) का प्रकोप नहीं बढ़ता है। साथ ही, बीजों को बुवाई के पूर्व थायरम या मेनकोजेब से 3 ग्राम प्रति कि. ग्रा. बीज की मात्रा से उपचारित करना चाहिए ताकि, बीज जनित या मिट्टी जनित रोगों का असर फसल में बहुत कम हो जाए। अच्छी उपज हेतु बीजों को 2-3 से.मी. की गहराई में लगाना चाहिए तथा पौधे से पौधे की दूरी 20 से.मी. X 8 से.मी. रखनी चाहिए।

खाद की मात्रा एवं खरपतवार नियंत्रण
अच्छी पैदावार के लिए प्रति हेक्टेयर 40:20:20 नत्रजन: स्फुर: एवं पोटाश क्रमशः का उपयोग किया जाना चाहिए, तथा नत्रजन की खुराक का विभाजित अनुप्रयोग 50 प्रतिशत बुवाई के समय एवं शेष 50 प्रतिशत को बुवाई के 25 दिनों बाद किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त जैव उर्वरक के रूप में 4-5 कि.ग्रा. पी. एस. बी. को कम्पोस्ट के साथ मिलाकर प्रति हेक्टेयर खेत में डालें। खरपतवार नियंत्रण हेतु गर्मियों में गहरी जुताई के साथ 30 दिन बाद एक निराई करें, साथ ही स्टेल सीड बेड + ओक्सीफ्लोरफेन 0.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर या 0.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर आइसोप्रोट्यूरान का उपयोग लाभकारी पाया गया है। इसके अलावा बुवाई के 20-25 दिनों बाद कतार के बीच में देशी हल से गुड़ाई करना सुझाया गया है।

उपज
फसल लगभग 100 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है, तत्पश्चात इसकी कटाई हंसिया की मदद से भूमि की सतह से 20- 25 से. मी. ऊपर से कर ली जाती है। औसतन छिटकवा विधि से 12- 15 क्विंटल एवं कतार बोनी विधि से 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन ली जा सकती है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने कोदो का समर्थन मूल्य 3000 रु. प्रति क्विंटल तय कर दिया है। ऐसा करने वाला, छत्तीसगढ़ देश का पहला एवं एक मात्र राज्य है जहाँ- मिलेट्स समर्थन मूल्य पर ख़रीदा जा रहा है। किसानो की सहूलियत के लिए कोदो-कुटकी एवं अन्य मिलेट्स का संग्रहण, राज्य लघु वनोपज संघ के समस्त प्राथमिक वनोपज सहकारी समिति के माध्यम से किया जा रहा है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था के सहयोग एवं मार्गदर्शन से किसान कोदो के प्रमाणित बीज का उत्पादन कर अच्छा मुनाफा अर्जित करने लगे हैं। वर्ष 2021- 22 में राज्य के 11 जिलों के 171 कृषकों द्वारा 3089 क्विंटल प्रमाणित बीज का उत्पादन किया गया, जिसे बीज निगम ने 4150 रु. प्रति क्विंटल की दर से किसानों से क्रय कर उन्हें 1 करोड़ 28 लाख 18 हज़ार रुपये से अधिक की राशि भुगतान किया है। मिलेट की खेती को प्रोत्साहन, किसानो को प्रशिक्षण, उच्च क्वालिटी के बीज की उपलब्धता तथा उत्पादकता में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए राज्य में मिलेट्स मिशन संचालित है। मिलेट्स मिशन लागु होने के बाद से छत्तीसगढ़ राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा अन्य शासकीय संस्थानों से समन्वय कर कोदो बीज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है, जिससे बीज उत्पादन में लगातार वृद्धि के साथ साथ किसानो को लाभ भी पहुँच रहा है । छत्तीसगढ़ मिलेट्स मिशन के तहत मिलेट की उत्पादकता को प्रति एकड़ 4.5 क्विंटल से बढ़ाकर 9 क्विंटल यानि दोगुना किये जाने का भी लक्ष्य रखा गया है।