संगीता, प्रभाकर सिंह एवं हेमन्त पाणिग्राही
फल विज्ञान विभाग,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

परिचय
जामुन भारत की देशी फसल है, क्योकि इसकी उत्पत्ति स्थान भारत माना गया है। इसका वैज्ञानिक नाम सिजीजियम कुमिनी है। इसके फल खाने के लिए और इसके बीज दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग किये जाते है। जामुन एक सदाबहार वृक्ष है, जिसकी औसतन ऊंचाई 25-30 मीटर होती है। इसके फल हरे रंग के होते है जो पकने के साथ गहरे बैंगनी रंग के हो जाते है। इसका गुदा गहरे लाल रंग का दिखाई देता है। इसके फल में अम्लीय गुण होता है। जिस कारण इसका स्वाद कसेला होता है। जामुन के अंदर कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिनके कारण इसका फल बहुपयोगी होता है। इसका पौधा एक बार लग जाने के पश्चात 50 से 60 वर्षो तक पैदावार दे देता है। जामुन को जमाली, राजामुन, ब्लैकबेरी, और काला जामुन के नामों से भी जानते है। वैसे तो इसका पूरा ही वृक्ष काम में लाया जाता है, किन्तु इसके फलो को खाने में अधिक पसंद करते है। जहां एक तरफ इसके फल खाने में स्वादिष्ट और स्वास्थय के लिए लाभकारी होते हैं, तो वहीं जामुन के बीज आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण में भी काम आते हैं।

जामुन के पोषक मूल्य
जामुन के फल में निम्नलिखित पोषक तत्व (प्रति 100 ग्राम फल) पाये जाते हैं -
  • ऊर्जा - 251 कैलोरी,
  • कार्बोहाइड्रेट - 14 ग्राम,
  • आहार फाइबर - 0.6 ग्राम,
  • वसा - 0.23 ग्राम;
  • प्रोटीन - 0.995 ग्राम,

विटामिन
  • थायमिन (बी 1) - 0.019 मिलीग्राम,
  • राइबोफ्लेविन (बी 2) - 0.009 मिलीग्राम,
  • नियासिन (बी 3) - 0.245 मिलीग्राम,
  • विटामिन बी 6 - 0.038 मिलीग्राम,
  • विटामिन सी - 11.85 मिलीग्राम,

खनिज
  • कैल्शियम - 11.65 मिलीग्राम,
  • आयरन - 1.41 मिलीग्राम,
  • मैग्नीशियम - 35 मिलीग्राम,
  • फास्फोरस - 15.6 मिलीग्राम,
  • पोटेशियम - 55 मिलीग्राम,
  • सोडियम - 26.2 मिलीग्राम,
  • पानी - 84.75 ग्राम इत्यादि।

फलों का उपयोग
  • इसके ताजे फलों को खाने में उपयोग किया जाता है।
  • इसके फलों को खाने से मधुमेह, एनीमिया, दाँत और पेट संबंधित बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
  • खाने के अलावा जामुन का उपयोग अनेक प्रकार की प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे - जेली, शरबत, जैम, शराब आदि बनाने के लिए करते है।
  • जामुन के बीज आयुर्वेदिक औषधि के निर्माण में भी काम आते हैं।
  • इसके अलावा जामुन के पेड़ की लकड़ी मजबूत एवं पानी से न खराब होने के कारण इसका उपयोग चौखट, पाटा, रेलवे के शयनकक्ष एवं अन्य फर्नीचर बनाने में किया जाता है।
  • जामुन या इसकी पत्तियों के रस को त्वचा पर लगाने से ये अधिक मात्रा में तैल को त्वचा पर आने से रोकता है, जिससे पिम्पल्स जैसी समस्याओ में आराम मिलता है।
  • जामुन की छाल एक अच्छी रक्तशोधक होती है, जो कि खून को साफ़ कर त्वचा के रोगो को दूर करती है।
  • जामुन के पके हुए फलों के रस को मुंह में भरकर, अच्छी तरह हिलाकर कुल्ला करें। इससे मुँह की समस्याओ में आराम मिलता है।
  • जामुन के पत्तों के रस से कुल्ला करने पर मुंह के छालों में लाभ होता है।
  • जामुन के पत्ते का रस बना कर पीने से दस्त में लाभ होता है।

फलों की तुड़ाई एवं भण्डारण
जामुन के फलों की तुड़ाई आमतौर पर मई-जून माह से शुरू हो जाती है तथा अगस्त तक चलती है। फूल खिलने के लगभग डेढ़ महीने बाद पकने शुरू हो जाते हैं। फलों के पकने के दौरान बारिश का होना लाभदायक होता है, क्योंकि बारिश के होने से फल जल्दी और अच्छे से पकते हैं। लेकिन बारिश अधिक तेज़ या तूफ़ान के साथ नही होनी चाहिए। जामुन के फलों को पकने के बाद उन्हें नीचे गिरने से पहले ही तोड़ा जाता है। फल काले या गहरे बैगनी होने पर तुड़ाई के योग्य हो जाते है। इसके फल की तुड़ाई प्रतिदिन करनी चाहिए। इसकी तुड़ाई आम रूप से वृक्ष के ऊपर चढ़ कर की जाती है। तुड़ाई के लिए काले-जमुनी रंग के फल चुने जाते हैं। तुड़ाई के समय ध्यान रखें कि फलों को कोई नुकसान न पहुंचे। फलो को तोड़ने के बाद उन्हें पानी से धोकर साफ कर लें। इस दौरान यदि कोई फल ख़राब दिखाई दे तो उसे अलग कर लेना चाहिए। फिर फलों को बांस की टोकरियों या लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता हैं। जामुन को कम तापमान पर 5-6 दिनों तक भण्डारित करके रखा जा सकता है। फलों को नुकसान से बचाने के लिए अच्छी तरह से पैकिंग करनी चाहिए और सही समय पर बाजार में बिक्री के लिए ले जाना चाहिए। जामुन का बाज़ारी भाव 60 से 80 रूपए प्रति किलो तक प्राप्त हो जाता है।