आर्सेनिक विषमता 

यह आर्गेनिक और इन आर्गेनिक आर्सेनिक दोनों से होता हैं। मुख्य रूप से यह पायजन पाचनतंत्र और हृदय को प्रभावित करता हैं। आर्सेनिक एक ऐसा पायजन हैं जो पशुओं व फसलों में विभिन्न रोग पैदा करने वाले बाहरी इक्टोपैरासाइट को मारने के लिए प्रयोग में ली जाने वाली दवाईयों के रूप में काम में लिया जाता हैं। 

कैसे होता हैं? 

एक्टोपैरासाइट (बाहपरजीवी) को मारने के लिए जब ये दवाइयां अधिक मात्रा में चमड़ी पर छिड़काव किया जाता हैं तो यदि पशु इसको अधिक मात्रा में चाट ले या इस दवा की कुछ मात्रा पीने के पानी में या चारा-दाना में मिल जाए। इसके अलावा चूहे, तिलचट्टों मारने आदि की दवाइयां चारा-दाना, पानी के साथ पेट में चली जाने पर आर्सेनिक विषमता होती हैं। 

लक्षण 

पषु मृतक अवस्था में मिलता हैं। इसमें लछड़ अचानक मिलते हैं। मांसपेषियों में कांपने जैसी गतिविधियां, जबरदस्त पेट दर्द अधिक लार, दांत किटकिटाने, पशु का दर्द से चिल्लाना, उल्टी, बदबूदार खूनी दस्त, शरीर में पानी की कमी, कमजोरी, पल्स, हृदय और ताप दर सामान्य मिलना। कब्ज तथा अनियमित भूख, लेकिन प्यास अधिक लगती हैं। त्वचा सूखे चमड़ी जैसी हो जाती हैं जिसमें कागज जैसी आवाज सुनाई देती हैं। त्वचा पर जगह-जगह पपड़ी होने से उखड़ने लगती हैं। बाल उखड़ते हैं और त्वचा मर सी जाती हैं। 

उपचार 
  • लक्षण के आधार पर उपचार करें। 
  • जिन पशुओं में उल्टी हो सकती हैं उनमें उल्टी करवाएं। 
  • गुन-गुना पानी पिलाकर गेसटरिक लैवेज करें। 
  • एक्टीवेटेड चारकोल पिलाएं। 
  • मैग्लीशियम सल्फेट या सेलाइन परगेटिव दें। 
  • सोडियम थायोसल्फेट (20-30 ग्राम) को 100 दूध पानी में मिलाकर गाय व घोड़े को पिलायें।
  • बी.ए.एल. 3 मि.ली. ग्राम प्रति शरीर भार आई/एम लगाएं। 
  • पशुओं को अनावश्यक वस्तुओं को चाटने से बचाएं। 
लेड (सीसा) 

पशुओं में विभिन्न प्रकार के धातुओं से होने वाली विषमता में लेड (सीसा) सबसे अधिक होती हैं। घरेलू फैक्ट्री, कृषि फार्म आदि में काम में ली जाने वाली की चीजों में लेड की मात्रा होती हैं और इन चीजों को चाटने, चबाने, खाने आदि से लेड विषमता हो जाती हैं। इन चीजों में रंग, फसलों पर छिड़कने वाली दवाइयां, मोटर बैटरी, बंदूक का बारूद, मोटर तेल, ग्रीस, सीसा युक्त पानी के पाइप से पानी पीना आदि प्रमुख हैं। 

लक्षण 
  • गाय इससे अधिक प्रभावित होती हैं। लक्षण एकाएक प्रकट हो जाते हैं, पशु गोल घेरे में घूमता हैं, सिर दीवार या पेड़ से दबाता हैं। 
  • अधिक लार, दांत किटकिटाना, मुंह बंद हो जाना। 
  • मिर्गी जैसे दौरे, अंधपन। 
  • पेट दर्द, दर्द के कारण चिल्लाना, आवाज में बदलाव, मांसपेशियों में कंपन। 
  • बार-बार तेज गति से पलक झपकना तथा आंखे घुमाना। 
  • छूने से व प्रकाश से अधिक उत्तेजित हो जाना। 
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना। 
  • काली कठोर गोबर, कभी-कभी दस्त। 
  • ज्वर सामान्य होना। 
  • सांस में कठिनाई। 
  • 12-21 घंटे में पशु की मृत्यु। 
उपचार 
  • केल्सियम इस डी.टी.ए. को 110 मि.ली. ग्राम प्रति शरीर भार नसों या चमड़ी में दिया जाता हैं। 
  • पाचनतंत्र में चलें गये पायजन को बाहर निकालने के लिए उल्टी एवं दस्त के लिए इमेटिकस और परगेटिव (मैग्निशियम सल्फेट) दिया जाता हैं।