झुलसा/प्रध्वंस/झौंका रोग (Blast) 

लक्षण- रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर 1-3 मि.मी. व्यास के भूरे, छोटे-छोटे धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं जो किनारों पर नुकीले होते है अर्थात धब्बे आँख के आकार के या नाव के आकार के बन जाते हैं। उक्त धब्बों का मध्य भाग धूसर रंग का तथा किनारों का रंग भूरा अथवा गाजरी भूरे रंग का होता है। इन धब्बों का रंग व आकार वातावरणीय कारकों, धब्बों की उम्र व धान की किस्मों की रोग सहिष्णुता पर निर्भर करता है। यह धब्बे आद्र वातावरणीय परिस्थितियों में धान की सहिष्णु किस्मों पर तेजी से बढ़ते हैं तथा कुछ समय तक धूसर रंग के होते हैं। पूरी तरह से विकसित धब्बा 1-1.5 से.मी. तक लम्बा, 0.3-0.5 से.मी. चौड़ा होता है। इस तरह आँख आकार व प्रकार वाले बहुत से धब्बे पत्ती पर बनते हैं जिसके कारण पत्तियां पर्णच्छद तक सूख जाती है। कंसे की अवस्था में पौधे खेतों में पूरी तरह से सूख जाते हैं। तने के डण्ठलों पर संक्रमण की अवस्था में छाल गल कर काले रंग में बदल जाती है तथा उक्त स्थान के सूखने से पौधा टूट कर नष्ट हो जाता है। रोग प्रकोप बाली की गर्दन पर होने की अवस्था में बाली के डण्ठल के चारों ओर भूरे रंग का फफूँद संक्रमण दिखार्इ देता है तथा बालियां उक्त स्थान से पकने के पूर्व टूट जाती है। इस अवस्था में रोग से फसल को सर्वाधिक (75 प्रतिशत तक) नुकसान होता है। बालियों में रोग संक्रमण से कई दाने भूरे पड़ जाते हैं तथा कर्इ दाने भर नहीं पाते हैं अर्थात बदरा (पोचे) रह जाते हैं। यदि रोग संक्रमण बालियों में दाने भरने से पूर्व होता है तो बालियां कुछ ही दानों से भरती है, दाने भरने के बाद संक्रमण होने पर उक्त दाने भूरे रंग के हो जाते हैं तथा सिकुड़ जाते हैं। रोग के प्रभाव से धान का बाजार मूल्य बहुत कम हो जाता है तथा उक्त उपज का बीज के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है।
रोग कारक: पाइरीकुलेरिया ग्रीसिया नामक फफूँद द्वारा । 

रोग प्रबन्धन 
  • रोग प्रबन्धन का सर्वाधिक प्रभावी उपाय प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों को उगाना है। धान की रोग प्रतिरोधी या सहनशील किस्में रोगरोधी जातियाँ जैसे-दुर्गेश्वरी, इंदिरा राजेश्वरी, कर्मा मासुरी व आई.आर.-64 का चयन करें।
  • बीज का चयन रोग मुक्त फसल से करें अथवा किसी विश्वसनीय संस्था से प्राप्त प्रमाणित बीज बोना चाहिये।
  • रोगी फसल अवशेषों को एकत्र कर जला दें तथा संपार्शिवक घास कुल के परपोषियों को ढूंढ कर नष्ट कर देना चाहिये।
  • नत्रजन की संतुलित मात्रा को कई बार देना चाहिये।
  • धान बीज को ट्राइसाइक्लाजोल नामक फफूँदनाशी द्वारा 1 ग्राम फफूँदनाशी प्रति किलो बीज के दर से उपचारित कर बुवाई करना चाहिये।
  • सर्वांगी फफूँदनाशी जैसे ट्राइसाइक्लाजोल (बीम या बान)- 6 ग्राम/10 ली. पानी, आइसोप्रोथियोलेन (फ्यूजीवन- 1 मिली./ली. पानी) या टेबुकोनाजोल (फालीक्यूर-1.5 मिली/ली. पानी) का छिड़काव करना चाहिये। रोग की तीव्रता के अनुसार 12-15 दिन बाद छिड़काव दुबारा करना चाहिये।

भूरा धब्बा रोग (Brown Spot) 


लक्षण- भूरा धब्बा रोग के लक्षण पत्तियों तथा बालियों पर दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त लक्षण पर्णच्छदों, प्रांकुरचोल एवं तुषों पर भी दिखाई देते हैं। पत्तियों पर उत्पन्न लक्षण विभिन्न आकार व प्रकार के होते हैं। यह छोटे बिन्दु आकार से शुरू होकर अण्डाकार, 1-14 X 0.3-7 मि.मी. माप के होते हैं। छोटे आकार के धब्बों का रंग गहरा भूरा व बैंगनी भूरा हो जाता है। बडे़ आकार के धब्बे किनारों पर गहरे भूरे रंग के, इनका मध्य भाग हल्का पीला, धूसर या भूरा तथा कभी-कभी इनके चारों ओर पीला घेरा बन जाता है। उग्र अवस्था में समान्यता यह धब्बे आपस में नहीं मिलते हैं तथा कभी कभी अनियमित आकार के हो जाते हैं। बुरी तरह प्रभावित पत्तियाँ भूरी होकर सूख जाती है। रोग का आक्रमण बाली निकलने के पूर्व उग्र रूप से होने पर बालियां नहीं निकल पाती है तथा पूर्ण विकसित हुए बगैर नष्ट हो जाती हैं। बाहर निकलने वाली बालियाँ विकृत रूप धारण कर लेती है। रोग के लक्षण तुषों पर भी दिखाई देते हैं। रोग ग्रस्त बालियों में तुषों का रंग गहरा भूरा, काला सा दिखाई देता है। रोग ग्रस्त बीज सिकुड़ जाते हैं तथा बदरंग हो जाते हैं। 

रोगजनक: ड्रेचेस्लेरा ओराइजी फफूँद द्वारा। 

रोग प्रबन्धन 
  • रोग सहनशील प्रजातियां जैसे-दन्तेश्वरी, इंदिरा सुगंधित धान-1 व कर्मा मासुरी का चयन बुवाई हेतु करना चाहिये। 
  • स्वस्थ प्रमाणित तथा स्वस्थ फसल से प्राप्त बीजों को ही बीज के लिए उपयोग करना चाहिये। 
  • पुष्ट बीजों का चयन 17 प्रतिशत नमक के घोल द्वारा करना चाहिये। 
  • चयनित पुष्ट बीज को साफ सुपर (कार्बेन्डाजिम + मेंकोजेब, 2.0 ग्रा./किलो बीज) से बीजोपचार करना चाहिये । 
  • संतुलित उर्वरक का उपयोग करना चाहिये। 
  • खड़ी फसल में रोग प्रकोप होने पर प्रोपीकोनाजोल (टिल्ट) फफूँदनाशी का 1 मि.ली. ली. पानी की दर से छिड़काव 12-15 दिन के अन्तर से तीन से चार बार अवश्य करें। कार्बण्डजिम 1 ग्रा./ली. पानी या क्लोरोथेलोनील (कवच) का 2 ग्रा./ली. पानी की दर से छिड़काव करना चाहिये।

पर्णाच्छ्द अंगमारी रोग (Sheath Blight) 


लक्षण- रोग धान में कंसे निकलने की अवस्था से गभोट की अवस्था तक देखा जा सकता है। रोग प्रकोप खेत में पानी की सतह से आरंभ होकर ऊपर की ओर फैलता है और अंतत: पौधा रोगग्रस्त होकर झुलस जाता है। पर्णच्छद व पत्तियों पर रोग लक्षण दिखाई देते हैं। पर्णच्छद पर 2-3 से.मी लम्बे 0.5 से.मी. चौड़े, भूरे से बदरंग धब्बे बनते हैं। प्रारंभ में धब्बे का रंग हरा-मटमैला या तांबे के रंग का होता है। बाद में बीच का भाग मटमैला हो जाता है जबकि धब्बों के किनारे भूरे रंग के होते हैं। रोग उग्र अवस्था में तने के ऊपर की ओर फैल जाता है व कभी-कभी धब्बों पर सफेद रंग का कवकजाल व राई के दाने के सामान कठकवक (स्क्लेरोशिया) दिखाई देते है। 
रोग कारक: राइजोक्टोनिया सोलेनाई फफूँद द्वारा। 

रोग प्रबन्धन 
  • रोगी फसल अवशेषों को जलाकर नष्ट कर देना चाहिये। पौधों की रोपाई निश्चित दूरी 15 x 10 हरुना किस्म या 20 x 10 से.मी. (माध्यम से देरी से पकने वाली किसमे) पर करें । 
  • रोगग्रस्त क्षेत्र में रोग सहनशील किस्म पंकज को लगाना चाहिये। 375;* खड़ी फसल में रोग प्रकोप प्रकोप की प्रारम्भिक अवस्था में हेक्साकोनाजोल (कोन्टाफ-1.0 मिली/ली. पानी) या प्रोपीकोनाजोल (टिल्ट- 1 मिली/ली. पानी) का छिड़काव 10-12 दिन के अन्तर से दो बार अवश्य करना चाहिये। 

कूट कलिका या लाई फूटना रोग (False Smut) 


लक्षण- इस रोग के लक्षण बाली निकलने के बाद दानों के बदले स्वरूप में दिखाई देते हैं। रोगी बालियों में दाने के स्थान पर स्मट बाल (गेंद) बन जाती है जिसका आकार दाने से काफी बड़ा होता है। ग्रसित बालियों में स्मट बाल का रंग पहले मटमैला हरा उसके बाद नारंगी व धान पकने की अवस्था में काला हो जाता है। छत्तीसगढ़ में इस रोग को लाई फूटना भी कहते हैं । 

रोग जनक: अस्टिलेजीनोइडीय वाइरेंस कवक। 

रोग प्रबन्धन 
  • संतुलित उर्वरक का उपयोग करें।
  • जिन किस्मों में इस रोग का प्रकोप अधिक होता है, उन्हें नहीं उगाना चाहिये।
  • बाली निकलने की प्रारंभिक अवस्था में तथा 50 प्रतिशत पुष्पीकरण होने पर मेंकोजेब (डायथेन एम-45) का 2.0 ग्रा./ ली. या प्रोपीकोनाजोल (टिल्ट) 1 एम.एल./ली. पानी की दर से दो बार छिड़काव करना चाहिये। 

जीवाणु जनित झुलसन रोग (Bacterial Blight) 


लक्षण- रोग के लक्षण सामान्यत: पत्तियों के किनारे पर रोग की प्रारंभिक अवस्था में जलसिक्त धब्बों के रूप में प्रकट होते हैं या पत्ती के ऊपरी भाग के कुछ से.मी. क्षेत्र पर जलसिक्त लकीरों के रूप में दिखाई देते हैं। इसके बाद धब्बे लम्बाई व चौड़ाई में वृद्धि करते हुए, किनारों पर लहरदार हो जाते है व कुछ दिनों के भीतर पीले रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। जैसे-जैसे धब्बे किनारों की तरफ बढ़ते हैं वहां पत्ती का स्वस्थ भाग पनीला हो जाता है। यह धब्बे हमेशा पत्ती के एक भाग से शुरू होकर दूसरे भाग की ओर बढ़ते हैं। जैसे-जैसे रोग की तीव्रता बढ़ती है, यह धब्बे पत्ती के पूरे भाग को ढंक लेते हैं तथा सफेद रंग में बदल कर मटमैले से हो जाते हैं। रोग प्रभावित पत्तियाँ सूख जाती है। नम मौसम में रोगी भागों पर छोटी-छोटी धुंधली बूंदो के रूप में हल्के रंग के जीवाणुज स्त्राव निकलता है तथा वर्षा न होने की स्थिति में यह सूखकर कठोर हो जाता है। रोग की पहचान खेतों में कांच के ग्लास में भरे हुए साफ पानी में रोग प्रभावित पत्ती को डालने पर कटे हुए भाग से स्त्रावित होती जीवाणु कोशिकाएं को देखकर की जा सकती है। 

रोग कारक: जैन्थोमोनास ओराइजी पैथोवार ओराइजी जीवाणु द्वारा। 

रोग प्रबन्धन 
  • रोग रोधी अथवा रोग सहनशील किस्में जैसे- उन्नत सांवा व बम्लेश्वरी का चयन करना चाहिये। 
  • रोगग्रस्त फसल से बीज का चयन न करें तथा प्रमाणित बीज किसी विश्वसनीय स्त्रोत से प्राप्त कर बोने के उपयोग में लाना चाहिये। 
  • संतुलित उर्वरक का उपयोग करें, साथ ही नत्रजन युक्त खादों का उपयोग अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिये । पोटाश का सही मात्रा में उपयोग रोग रोधिता प्रदान करता है। 
  • रोग प्रकोप होते ही खेत में पानी का बदलाव करें। खेत का पानी निकालकर 25 किलो पोटाश/हे. की दर से छिड़काव करना चाहिये तथा 3-4 दिनों तक खेत में पानी नहीं भरना चाहिये।