द्रोणक कुमार साहू (पीएचडी स्कॉलर, कृषि अर्थशास्त्र), कपिल कुमार सोनी (कृषि व्याख्याता) एवं चंद्रशिखा (पीएचडी स्कॉलर, वानिकी) 
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर,(छ.ग.) 


शिमला मिर्च का सब्जियों में अपना एक अलग ही महत्व है देखा जाता है कि पहले शहरों में ही शिमला मिर्च को सब्जी के रूप में खाया जाता है लेकिन कुछ समय से इसकी मांग लगातार ग्रामीण अंचलों में बनी हुई है और इसकी मांग लगातार छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों की बाजारों में दिखा जा रहा है तो किसान भाइयों के पास अवसर है कि वह शिमला मिर्च का उत्पादन कर व्यवसायिक रूप में इसकी खेती कर सकते हैं जिससे वह अत्यधिक लाभ कमा सकते हैं और आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं शिमला मिर्च को अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है स्वीट पेपर, ग्रीन पेपर, बेल पेपर यह इसके अलग-अलग नाम है मिर्च के मुकाबले शिमला मिर्च कम तीखा होता है इसमें विटामिन ए तथा विटामिन सी प्रमुख रूप विटामिन सी प्रमुख रूप से पाया जाता है इसीलिए इसको सब्जी के रूप सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है इसलिए अब शिमला मिर्च की मांग बहुत बढ़ती जा रही है ।

जलवायु : यह नर्म आर्द्र जलवायु की फसल  है,इसका  देश के अलग-अलग राज्यों में की फसल ली जाती है लेकिन छत्तीसगढ़ में सामान्यतः शीत ऋतु में तापमान 10° सेल्सियस से अक्सर नीचे नहीं जाता एवं ठंड का प्रभाव बहुत कम दिनों के लिए रहने के कारण इसकी वर्षभर फसल ली जा सकती है इसकी अच्छी वृद्धि  एवं विकास के लिए 21 से 25° सेल्सियस तापक्रम उपयुक्त रहता है शीत ऋतु में पढ़ने वाला पाला इसके लिए हानिकारक होता है। ठंडे मौसम में इसके फुल कम लगते हैं तथा फल छोटे, कड़े एवं  टेड़े मेढ़े आकार के हो जाते हैं तथा अधिक तापमान (33° सेल्सियस से अधिक होने) के होने से इसके फूल एवं फल झड़ने लगते हैं।भूमि इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली चिकनी दोमट मृदा जिसका पीएच  मान 6 से 6.5 सर्वोत्तम माना जाता है वहीं बलुई दोमट मृदा में अधिक खाद डालकर एवं सही समय उचित सिंचाई प्रबंधन द्वारा खेती की जा सकती है। 
        
उन्नत किस्में : अर्का गौरव, अर्का मोहनी, किंग ऑफ नॉर्थ, अर्का बसंत, ऐश्वर्या, अलंकार, अनुपमा, हरी रानी, पूसा दीप्ति,भारत, ग्रीन गोल्ड, हीरा, इंदिरा शिमला मिर्च की उन्नत किस्में है किसान इसमें से किसी भी किस्म का चुनाव कर सकते हैं।
         
बीज दर: सामान्य किस्म 450 से 500 ग्राम एवं संकर शिमला 200 200 से 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर रहता है।वृद्धि नियंत्रक शिमला मिर्च की उपज बढ़ाने के लिए ट्राइकोन्टानॉल  1.25 पीएम (1.25 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी) रोपण के बाद 20 दिन की अवस्था से 20 दिन के अंतराल पर 3 से 4 बार स्प्रे करना चाहिए

खाद एवं उर्वरक: 
शिमला मिर्च की खेती के लिए खेत की तैयारी करते समय 25 से 30 टन गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद डालना चाहिए आधार खाद के रूप में रोपाई के समय में रोपाई के समय के समय 60 किलोग्राम नाइट्रोजन 60 से 80 किलोग्राम सल्फर एवं 40 से 60 किलोग्राम पोटाश डालना चाहिए।
 
नर्सरी तैयार करना: 
शिमला मिर्च की पौध को नर्सरी में तैयार किया जाना आवश्यक है इसके लिए 3×1 मीटर आकार के जमीन के 1 मीटर से ऊपर उठी हुई क्यारियां बनाना चाहिए इस तरह 5 से 6 क्यारियां एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त रहती है प्रत्येक क्यारी में दो से तीन टोकरी गोबर की अच्छी सड़ी हुई खाद डालना चाहिए मृदा को उपचारित करने के लिए 1 ग्राम बावस्टिन को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

निराई गुड़ाई रोपण के बाद शुरू के 30 से 45 दिन तक खेत को खरपतवार मुक्त खरपतवार मुक्त रखना जरूरी होता है कम से कम दो निराई गुड़ाई इसके लिए अति लाभप्रद होता है पहली निराई गुड़ाई रोपण की 25 एवं दूसरी 45 दिन के बाद करना चाहिए पौध रोपण की 30 दिन बाद पौधों में मिट्टी चढ़ाना चाहिए ताकि उन्हें मजबूत हो सके और उत्पादन में वृद्धि हो सके। 

पौधों को सहारा देना:
शिमला मिर्च में पौधों को प्लास्टिक या जुट की सुतली से बांधकर ऊपर की ओर बढ़ने दिया जाना चाहिए जिससे फल गिरे भी नहीं और फलों का आकार भी अच्छा हो। पौधों को सहारा देने से फल मिट्टी एवं पानी से पानी के संपर्क में नहीं आ पाते जिससे फल सड़ने सड़ने का समस्या उत्पन्न नहीं होता है।
 
फूल व फल गिरने का रोकथाम:
शिमला मिर्च में फूल लगना प्रारंभ होते ही प्लानोफिक्स दवा को 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव करना चाहिए इसके 25 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें इससे फूल का झड़ना कम हो जाता है और फल अच्छे आते हैं एवं उत्पादन में वृद्धि होती है।
 
प्रमुख कीट एवं रोग प्रमुख: 
इसमें प्रमुख रूप से माहो, सफेद मक्खी व मकड़ी का प्रयोग प्रकोप ज्यादा होता है रोकथाम इनकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट या मिथाइल डेमेटान या मेलाथियान का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की हिसाब से घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर 2 से 3 बार छिड़काव करें । फलों के तुड़ाई के बाद ही रसायनों का छिड़काव करना चाहिए
 
प्रमुख रोग:
इसमें प्रमुख रूप से आद्रगलन, भभूतिया,उकठा, पर्ण कुंचन, श्यामवर्ण व फल सड़न का प्रकोप होता है।
आद्रगलन का प्रकोप नर्सरी अवस्था में होता है इसमें जमीन की सतह वाले तने का भाग काला पडकर गल जाता है और छोटे पौधे गिरकर मरने लगते हैं।
 
रोकथाम: बुवाई से पूर्व बीजों को थाइरम, केप्टान या बाविसिटीन 2.5 से 3 ग्राम किलो बीज की दर से उपचारित करें, नर्सरी के आसपास की भूमि से 6 से 8 इंच ऊंची हुई भूमि में बनाये।
 
भभूतिया रोग: यह रोग ज्यादातर गर्मियों में आता है इस रोग में पत्तियों पर सफेद चूर्ण युक्त धब्बे बनने लगते हैं, रोग की तीव्रता होने पर पत्तियां पीली पढ़कर सूखने लगती है और पौधा बोना हो जाता है जिससे उत्पादन कम होता है।
 
रोकथाम: इसके रोकथाम के लिए सल्फेक्स का 0.2% सांद्रता का घोल 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करना चाहिए फूल आने के बाद उपरोक्त कीटनाशक दवाओं के स्थान पर मेलाथियान 50 ई सी एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
 
फल सड़न: रोग के शुरुआती लक्षणों में पत्तियों के शुरुआती लक्षणों में पत्तियों शुरुआती लक्षणों में पत्तियों पर छोटे छोटे काले धब्बे बनते हैं रोग की तीव्रता होने पर शाखायें ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती है फलों के पकने की अवस्था में छोटे छोटे काले काले गोल धब्बे बनने लगते है। फसल चक्र अपनाना चाहिए तथा मैनकोज़ेब 0.2% सांद्रता का घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए

फलों की फलों की तुड़ाई: शिमला मिर्च की तुड़ाई पौध रोपण के 65 से 70 दिन बाद प्रारंभ हो जाती है जो कि 90 से 120 दिन बाद चलता है उन्नतशील किस्मों में 100 से 120 क्विंटल एवं संकर किस्मों में में 200 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज निकलती है। 

शिमला मिर्च को आसानी से 40 से 50 रूपये किलोग्राम के रेट से बेचा जा सकता है यदि 1 हेक्टेयर में 100 कुन्तल उत्पादन भी होता है तो इस हिसाब से चार लाख तक का कुल उत्पादन हो जाता है यदि इसमें किसान का खर्च 2 लाख रुपये होता है तो वह आसानी से वह दो लाख से 3 लाख रुपये तक की बचत कर सकता है और उसे अधिक लाभ प्राप्त कर सकता है।