छविराज बघेल, नितिन कुमार तुर्रे, मनोज कुमार चंद्राकर एवं दिवेदी प्रसाद
पं. शिव कुमार शास्त्री कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,
भूमिका
भारत की कृषि प्रणाली विश्व की सबसे विविध एवं जटिल कृषि प्रणालियों में से एक है। हरित क्रांति के पश्चात् देश में खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, परंतु इस वृद्धि का मुख्य आधार रासायनिक उर्वरकों विशेषकर नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) और पोटाश (K) का असंतुलित एवं अत्यधिक उपयोग रहा। परिणामस्वरूप, जहाँ एक ओर उत्पादन बढ़ा, वहीं दूसरी ओर मृदा स्वास्थ्य में गिरावट और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी गंभीर समस्या बनकर उभरी।सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) जैसे जस्ता (Zn), लोहा (Fe), मैंगनीज (Mn), तांबा (Cu), बोरॉन (B), मोलिब्डेनम (Mo) तथा क्लोरीन (Cl) पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए अत्यल्प मात्रा में आवश्यक होते हैं, किंतु इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ये एंजाइम क्रियाओं, प्रकाश संश्लेषण, प्रोटीन संश्लेषण, हार्मोन संतुलन एवं प्रतिरोधक क्षमता को नियंत्रित करते हैं।वर्तमान में भारत की लगभग 40–50% कृषि भूमि जस्ता की कमी से प्रभावित है, जबकि 12–15% भूमि में लोहा की कमी तथा 20% से अधिक क्षेत्रों में बोरॉन की कमी पाई जाती है। गहन खेती, उच्च उत्पादक किस्मों का उपयोग, फसल अवशेषों की निकासी, और जैविक पदार्थों की कमी ने इस समस्या को और बढ़ाया है।इन परिस्थितियों मेंसूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग (Micronutrient Budgeting)एक वैज्ञानिक एवं दीर्घकालिक समाधान के रूप में सामने आई है, जिसका उद्देश्य मिट्टी में पोषक तत्वों के आगमन और निर्गमन के संतुलन का आकलन कर सतत कृषि सुनिश्चित करना है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व एवं कार्य
सूक्ष्म पोषक तत्वों की भूमिका निम्न प्रकार से स्पष्ट की जा सकती है—
- जस्ता (Zn): ऑक्सिन हार्मोन के संश्लेषण में सहायक, प्रोटीन निर्माण में महत्वपूर्ण। कमी होने पर पत्तियाँ छोटी एवं पीली हो जाती हैं।
- लोहा (Fe): क्लोरोफिल निर्माण में आवश्यक। इसकी कमी से इंटरवेनियल क्लोरोसिस देखा जाता है।
- बोरॉन (B): परागण, पुष्पन एवं फलन में सहायक। कमी से फल झड़ना एवं विकृति होती है।
- मैंगनीज (Mn): प्रकाश संश्लेषण एवं एंजाइम क्रियाओं में महत्वपूर्ण।
- तांबा (Cu): प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट चयापचय में भूमिका।
- मोलिब्डेनम (Mo): नाइट्रोजन स्थिरीकरण में आवश्यक।
यदि इन तत्वों की निरंतर निकासी होती रहे और पुनः पूर्ति न की जाए, तो मिट्टी की उत्पादकता घटने लगती है, जिससे दीर्घकाल में कृषि अस्थिर हो जाती है।
सूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग की अवधारणा
सूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग का आशय है—
मृदा-फसल प्रणाली में पोषक तत्वों केइनपुट (प्रवेश)औरआउटपुट (निकास)का वैज्ञानिक आकलन।
(क) इनपुट स्रोत:
- रासायनिक उर्वरक
- जैविक खाद (गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट)
- फसल अवशेष
- जैव उर्वरक
- सिंचाई जल
(ख) आउटपुट स्रोत:
- फसल द्वारा अवशोषण
- लीचिंग
- मृदा अपरदन
- वाष्पीकरण एवं रासायनिक अभिक्रियाएँ
यदि आउटपुट, इनपुट से अधिक हो जाता है तो मिट्टी में कमी उत्पन्न होती है। बजटिंग का उद्देश्य इस असंतुलन को पहचानकर संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाना है।
भारत में सूक्ष्म पोषक तत्वों की वर्तमान स्थिति
विभिन्न मृदा सर्वेक्षणों के अनुसार—
- लगभग 45% भारतीय मिट्टियाँ जस्ता की कमी से प्रभावित हैं।
- 15–20% मिट्टियाँ बोरॉन की कमी दर्शाती हैं।
- 10–12% क्षेत्रों में लोहा की कमी पाई गई है।
- क्षारीय एवं उच्च pH वाली मिट्टियों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो जाती है।गहन सिंचाई, मोनोक्रॉपिंग, और जैविक पदार्थों की घटती मात्रा ने इन कमियों को बढ़ाया है।
सतत कृषि में सूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग की भूमिका
सतत कृषि का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन प्राप्त करना नहीं, बल्कि दीर्घकालीन मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण भी है। सूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग निम्न प्रकार से सहायक है—
- मृदा उर्वरता संरक्षण: पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करता है।
- उर्वरक दक्षता में वृद्धि: अनावश्यक लागत कम होती है।
- फसल गुणवत्ता सुधार: पोषण युक्त अनाज उत्पादन संभव।
- पर्यावरण संरक्षण: लीचिंग एवं प्रदूषण में कमी।
- पोषण सुरक्षा: सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध खाद्यान्न।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना जैसे कार्यक्रमों ने संतुलित पोषण प्रबंधन को बढ़ावा दिया है, जिससे किसानों को वैज्ञानिक सलाह प्राप्त हो रही है।
चुनौतियाँ एवं समाधान
चुनौतियाँ:
- मृदा परीक्षण की सीमित पहुँच
- किसानों में जागरूकता की कमी
- जैविक पदार्थों की घटती मात्रा
- असंतुलित उर्वरक सब्सिडी नीति
समाधान:
- मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक सिफारिश
- एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM)
- फसल चक्र एवं अवशेष प्रबंधन
- सूक्ष्म पोषक तत्व समृद्ध उर्वरकों का प्रयोग
- किसानों के लिए प्रशिक्षण एवं विस्तार सेवाएँ
निष्कर्ष
सूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग सतत कृषि की दिशा में एक अनिवार्य कदम है। यदि हम मिट्टी से निकाले गए पोषक तत्वों की उचित पुनःपूर्ति सुनिश्चित नहीं करेंगे, तो भविष्य में उत्पादन क्षमता में गिरावट अवश्यंभावी होगी। संतुलित पोषण प्रबंधन, मृदा परीक्षण, जैविक संसाधनों का उपयोग तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर हम दीर्घकालिक कृषि स्थिरता प्राप्त कर सकते हैं।इस प्रकार, सूक्ष्म पोषक तत्व बजटिंग केवल मृदा प्रबंधन की तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षित, समृद्ध एवं टिकाऊ कृषि प्रणाली की आधारशिला है।

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