नितिन कुमार तुर्रे, मनोज कुमार चंद्राकर एवं छविराज बघेल
पंडित शिवकुमार शास्त्री कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, राजनांदगांव

कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए रसायनों के दुष्प्रभाव से मृदा प्रदूषण, पर्यावरण क्षरण, मनुष्य एवं जानवरों के स्वास्थ्य पर भयंकर दुष्प्रभाव के साथ-साथ फसल के लिए आवश्यक अन्य मित्र जीवों के लिये भी हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। इन दुष्प्रभावों को रोकने या कम करने के लिये जैविक नियंत्रण विधियों का अधिकाधिक उपयोग करना जरूरी हो गया है। जैविक नियंत्रण विधि में फसलों के हानिकारक रोगजनक फफूंद व कीटों को नष्ट करने के लिए लाभदायक फफूंद व कीटों का उपयोग किया जाता है। साथ ही अधिक उपज प्राप्त करने के लिये भी इन विधियों का प्रयोग किया जाता है। जैविक नियंत्रण सरल, सस्ते व आसानी से उपलब्ध हो सकते है। इनके बनाने के तरीके भी आसान है। कीट-व्याधिया रोकने के लिये इनकी विस्तृत श्रृंखला भी आज बाजार में उपलब्ध है।

पादप रोगों का जैविक नियंत्रण:-
फसलों में रोग जैसे - उकठा, बीज सड़न, अंगमारी, आर्द्रगलन, जड़सड़न, काॅलर राॅट आदि पैदा करने वाले रोगजनक फफूंद जैसे स्कलेरोशियम, राइजोक्टोनिया, फ्यूजेरियम, पीथियम फाइटोफ्थोरा आदि को नियंत्रित करने के लिये ट्रायकोडर्मा, पेनिसिलियम, ग्लोमस, ग्लिओक्लेडियम आदि जैव नियंत्रकों का प्रयोग करना चाहिये । साथ ही रोग फैलाने वाले जीवाणुओं को नष्ट करने के लिये भी लाभदायक जीवाणु जैसे स्यूडोमोनास प्रजाति, बैसिलस सबटिलिस एग्रोबैक्टिरियम प्रजातियां आदि का जैव नियंत्रकों के रूप में प्रयोग हो रहा है। इन जैव नियंत्रकों को बीजोपचार, मृदा उपचार व पर्णीय छिड़काव हेतु प्रयोग किया जा सकता है। बीज में उपस्थित रोगजनकों को अन्य रोगजनकों के प्रयोग द्वारा नष्ट किया जा सकता है। आजकल बाजार में कई पंजीकृत जैव नियंत्रक फफूंदनाशी उपलब्ध है जिन्हें बीज उपचारित करके भयंकर रोगों से फसल की सुरक्षा संभव है। ये जैव नियंत्रक फफूंद, फफूंदनाशी के रूप में विभिन्न नामों से उपलब्ध है। ट्राइकोडर्मा हारजिएनम को विभिन्न मृदाजनित रोगजनकों के नियंत्रण के लिए उपयोग किया जा सकता है। ग्लिओक्लेडियम वाइरेन्स द्वारा राइजोक्टोनिया व पीथियम फफूंदों को नष्ट किया जा सकता है व कपास में डेम्पिंग-आॅफ रोग से बचा जा सकता है। इसी प्रकार बैसिलस-सबटिलिस द्वारा बीज उपचार कर कई बीजजनित फफूंदों के आक्रमण से बचा जा सकता है।

मृदा के हानिकारक फफूदों की संख्या कम करने के लिये विभिन्न जैविक पदार्थों जैसे नीम, करंज, अलसी, अरंडी की खली, हरी खाद, नील हरित शैवाल, गोबर की खाद, हरी तथा सूखी पत्तियों की खाद, लकड़ी का बुरादा सहित विभिन्न किस्म के जैविक पदार्थों का उपयोग करना चाहिये । इन जैविक पदार्थों को खेतों में जुताई समय सिंचाई कर मिलाने से मृदा में कई प्रकार के कार्बनिक रसायन मिलते हैं जो रोगकारकों के लिये नुकसानदायक होते हैं तथा हानिकारक फफूंदों की संख्या को कम करने में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहायक सिद्ध होते है। नीम खली से मृदा उपचार करने पर सूत्रकृमियों व मृदा जनित रोगजनकों पर नियंत्रण मिलता है साथ ही जैविक पदार्थों के उपयोग से मृदा की जलधारण क्षमता में बढ़ोत्तरी, मृदा संरचना में सुधार, मृदा उर्वरा क्षमता बढ़ना जैसे कई फायदे हैं, जो कृषक की आय बढ़ाने में सहायक होते है। इन जैव नियंत्रकों का सही समय पर, सही तरीके से उपयोग व अन्य सावधानियां आदि कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लेकर करना और मददगार साबित होगा ।

हानिकारक कीटों का जैविक नियंत्रण:-
फसलों के हानिकारक कीटों को नष्ट करने के लिए एन. पी. वी. (न्यूक्लीयर पाॅलीहीड्रोसिस वायरस), मेटाराइजियम एनीसोप्ली, बिवेरिया वेसियाना, बैसिलस थुरिन्जियेन्सिस आदि का उपयोग करना चाहिये । एन. पी. वी. के प्रयोग से चने व टमाटर का फलीछेदक, तम्बाकू की इल्ली, कपास की चित्तीदार इल्ली आदि नियंत्रित होते है। बैसिलस थुरिन्जियेन्सिस जीवाणुवीय प्रकृति का जैव कीटनाशक है जो कि लेपीडोप्टेरा, डिप्टेरा व कोलियोप्टेरा वर्ग के कीटों को नियंत्रित करता है। मेटाराजियम एनीसोप्ली कवकीय प्रकृति का जैव कीटनाशक है जो कि हानिकारक कीटों की क्यूटिकल पर संक्रमण कर उसे नष्ट कर देता है। इस प्रकार मित्र कीटों को हानि पहुंचाये बिना ही नुकसानदायक कीटों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। इसी प्रकार कई किस्म के पौध जीवकीटनाशीयों जैसे नीम का कीटनाशी के रूप में प्रयोग, लहसुन व मिर्च का घोल, राख, करंज की खली आदि के उपयोग से भी दीमक, टिड्डी, माहो, फौजी कीट, चने व तम्बाकू की इल्ली, भंडारण के कीटों व रस चूसने वाले कीटों का नियंत्रण किया जा सकता है। इन जैविक कीटनाशकों के उपयोग से पर्यावरण व पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है। साथ ही इन जैविक कीटनाशकें के प्रयोग के तुरंत बाद फल, सब्जियों व अन्य कृषि उत्पादों को उपयोग में लाया जा सकता है व रासायनिक कीटनाशकों की खपत को कम किया जा सकता है।

लाभदायक जीवाणुओं से उपज में वृद्धि
राइजोबियम जीवाणु कल्चर से उपचारित बीजों से दलहनी फसलों को 10-15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक नत्रजन की आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है। फसलों के बीजों को पी. एस. बी. कल्चर (फाॅस्फोरस साॅलुबिलाइजिंग बैक्टिरिया कल्चर) से उपचारित करने से मृदा में पाया जाने वाले अप्राप्य फाॅस्फोरस तत्व प्राप्त रूप में बदल जाता है। उसके लिए 5 ग्राम पी. एस. बी. कल्चर प्रति किलो बीज की दर से प्रयोग करना चाहिए । एजोस्पाइरिलम जीवाणु मृदा में स्वतंत्र रूप से निवास करते हुये वायुमण्डलीय नत्रजन को इकट्ठा कर पौधे को देता है। शोध परिणामों से यह देखा गया है कि एजोस्पाइरिलम के प्रयोग से 10 प्रतिशत तक फसल की उपज में वृद्धि प्राप्त की जा सकती है। इन उपचारित बीजों को बोने से पैदावार बढ़ेगी व उर्वरकों की लागत भी कम आयेगी ।

जैव उर्वरक के सूक्ष्म जीव उपजाऊ भूमि में सामान्यतः पाए जाते हैं तथा विभिन्न प्रकार के पोषक तत्वों को पौधों को उपलब्ध कराने में सहायता प्रदान करते है तथा विटामिन एवं वृद्धि हारमोन की उत्पत्ति तथा रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ाकर मृदा की उर्वरकता को बनाए रखने में सहायक होते हैं, जो निम्नलिखित हैः-

1. एजेटोबैक्टरः- यह एक जीवाणु है, जो एक बीजपात्री पौधों में नत्रजन स्थिरीकरण करने की क्षमता रखता है। इसे प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है इस्तेमाल के पूर्व बीजों को गुड़ या चीनी के घोल में नम कर खाद को बीज में मिला देते हैं तथा कुछ देर सुखाने के बाद बुआई कर दी जाती है। इस खाद को मुख्यतः गेहु, कपास, बाजरा, सूरजमुखी, मक्का, सरसों, तिल, सब्जियों व पुष्पीय पौधों हेतु प्रयोग में लाया जाता है।

इसे पौधे रोपणी में प्रयोग में लाकर अच्छे पौधे प्राप्त कर सकते हैं।

2. ऐजोलाः- यह शैवाल पानी में पाया जाता है। इसकी खाद प्रयोगशाला में तैयार की जाती है।

ऐजोला को सात प्रजातियां मुख्य रूप से प्रचलित है।

1. ऐजोला मैक्सिकाना 2. ऐजोला केरोनिआना 3. ऐजोला माइक्रोफिला 4. ऐजोला रूब्रा 5. ऐजोला निलोटिका 6. ऐजोला किलीकुलोइडसी 7. ऐजोला पिन्नेटा। ऐजोला पिन्नेटा भारत में प्रमुख रूप से पाई जाने वाली प्रजाति दे तथा यह धान की फसलों के लिए उपयुक्त पाई गयी है।

3. एजोस्पाइरिलमः- ऐजोस्पारिलम जीवाणु को क्रियाशील होने के लिए अधिक तापमान की आवश्यकता होती है, अतः यह जीवाणु खाद जिन क्षेत्रों में अधिक तापमान होता है, वहां के लिए अत्यंत उपयुक्त है। यह खाद मक्का, ज्वार, बाजरा, धान आदि के अलावा पुष्पीय पौधों में भी प्रयुक्त भी जाती है। तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों में इसका प्रयोग पौध वृद्धि हेतु सहायक पाया गया है। ऐजोस्पाइरिलम की प्रमुखतः चार प्रजातियां प्रचलित हैः- 1. ऐजोस्पिारिलम एमोजोन्स 2. एजोस्पाइरिलम लिपोफेरम 3. एजोस्पाइरिलम हेलोप्रेफरस 4. एजोस्पारिलम ब्राजिलेंस।

4. नील हरित शैवाल (बी.सी.ए.):- यह शैवाल पानी वाले स्थान पर पाया जाता ह, जिसे जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसे धान के खेत में रोपाई के 10-15 दिन बाद पानी से भरे खेत में डाल दिया जाता है तथा पानी खेत में बनाए रखते हैं। कुछ दिनों बाद इस प्रक्रिया को अपनाने से नील हरित शैवाल की मोटी परत बन जाती है, जो नत्रजन स्थिरीकरण में मुख्य भूमिका निभाकर पौधे की वृद्धि में सहायक होती है। इस खाद की धान के लिए उत्तम माना गया है।

5. वर्मीकम्पोस्ट:- केंचुए द्वारा प्राकृतिक रूप से क्रियाऐं करके बनाई जाने वाली खाद को वर्मीकम्पोस्ट कहते हैं। उपयुक्त तापमान कम दवा तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वो में प्राप्त होने पर केंचुए अपनी संख्या में वृद्धि करते जाते हैं तथा साथ ही साथ गोबर एवं वानस्पतिक अवशेष आदि को सड़ाकर जैविक खाद के रूप में परिवर्तित करते रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट गहरे रंग का जैविक पदार्थ अथवा हृाूमस होता है जिसके प्रयोग से मृदा की भौमिक दशा में सुधार होता है, मृदा में वायु की आवागमन तथा जलधारण क्षमता में वृद्धि हो जाती है। खाद की नमी के कारण सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों में वृद्धि होती है तथा जिसके फलस्वरूप पोषक तत्वों की प्राप्ति में भी वृद्धि होती है जिसमें गोबर खाद से भी 2-3 तत्व अधिक पाए जाते हैं। विशेष रूप में फास्फोरस अधिकता में पाया जाता है, जिससे पौधों का विकास अच्छा होता है।

6. राइजोबियम जीवाणु खादः- यह जीवाणु सहजीवी के जड़ो में छोटी-छोटी ग्रंथियों में मिलता है। वर्तमान में इसका प्रयोग प्रयोगशाला में सहजीवी के रूप में विकसित करके किया जाता है। इसको बीजोपचार करके प्रयोग किया जाता है। जिससे वायुमण्डलीय नत्रजन मृदा में संचित होती है, तथा पौधों की वृद्धि में बढ़ोत्तरी होती है। इसका प्रयोग मुख्यतः सोयाबीन, चना, मटर, मैथी, मूंगफली तथा उड़द आदि में बहुत लाभकारी पाया गया है तथा वानिकी एवं कृषि वानिकी हेतु बहुमूल्य खाद है।

जैविक खाद का प्रयोग बीज उपचार, मृदा उपचार, जड़ उपचार अथवा खड़ी फसल पर जैव उर्वरक की उपचार करके किया जाता है। जैव उर्वरक की उपचार करके किया जाता है। जैव उर्वरक को रासायनिक खाद के साथ मिश्रित नहीं करना चाहिए ताकि स्प्रे द्वारा प्रयोग में लाने से कोई लाभ नहीं मिलता। बाजार में जैविक उर्वरक उपलब्ध है, जिन्हें विश्वसनीय अच्छी कंपनी का खरीदना चाहिए। जब उर्वरक में उपस्थित जीवाणुओं के विकास के लिए जीवांश खाद (गोबर खाद) समय-समय पर देना चाहिए ताकि भूमि में जीवांश को उचित मात्रा बनी रहे तथा उनके कार्यशील जीवाणुओं का विकास होता रहे। वर्मीकम्पोस्ट तथा अन्य प्राकर की जीवाणु खादों का प्रयोग फल वृक्षों, कृषि में बागवानी में तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों में पौधों की वृद्धि बढ़ाने में तथा मृदा की उर्वराशक्ति कायम रखने में लाभकारी सिद्ध हुआ है।