प्रतिभा शिव1, शैलेश चन्द्र2, संदीप कुमार सरोज3
शोधार्थी कृषि यंत्रिकी एवं शक्ति अभियांत्रिकी विभाग,
गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखण्ड1,3
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छ. ग.)2


भूमिका
भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश है जहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों टन फसल अवशेष उत्पन्न होते हैं। वर्तमान अनुमान के अनुसार देश में लगभग 62 करोड़ टन कृषि अवशेष उत्पन्न होते हैं। इनका एक हिस्सा पशु आहार, जैविक खाद, बायोएनर्जी तथा औद्योगिक उपयोग में लाया जाता है परंतु दुर्भाग्यवश इन अवशेषों का बड़ा भाग खेतों में जलाकर नष्ट कर दिया जाता है।फसल अवशेष जलाने से न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, मानव स्वास्थ्य, जलवायु और जैव विविधता पर भी गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं।

वायुमंडल पर प्रभाव
फसल अवशेषों के जलने से वायु में कई प्रकार के प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं कुल उत्सर्जन में लगभग 40% भाग कार्बन डाइऑक्साइड का होता है जबकि कार्बन मोनोऑक्साइड लगभग 32% तक उत्सर्जित होती है। इसके अतिरिक्त हाइड्रोकार्बन का स्तर लगभग 50 % तक पाया जाता है जो वातावरण में विषाक्त गैसों की मात्रा बढ़ाता है। वहीं PM 2.5 और PM 10 जैसे कणिका तत्व अत्यंत खतरनाक स्तर पर मौजूद होते हैं जिन्हें श्वसन तंत्र के लिए अत्यधिक जोखिम वाला माना जाता है। ये प्रदूषक वातावरण में धुंध (Smoke) बनाते हैं तथा वायु गुणवत्ता सूचकांक को बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंचा देते हैं जैसा कि उत्तर भारत में अक्टूबर–नवंबर के महीनों में देखा जाता है।

मृदा एवं पर्यावरणीय दुष्परिणाम
मिट्टी की कार्बनिक मात्रा एवं संरचना में कमी, मिट्टी की नमी धारण क्षमता में गिरावट, लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं केंचुओं और नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया का नाश, भूमि की दीर्घकालिक उर्वरता में कमी, वाष्पीकरण दर में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन जैसे दुष्परिणाम दिखाई पड़ते हैं।

डायऑक्सिन: अदृश्य लेकिन घातक प्रदूषक
पराली जलाने से सबसे अधिक डायऑक्सिन (Dioxin) नामक विषैली गैस उत्सर्जित होती है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैंसरकारी प्रदूषकों की श्रेणी में आती है। यह गैस वातावरण में लंबे समय तक बनी रहती है और खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में प्रवेश करके यकृत (Lever), अंतःस्रावी प्रणाली (Hormonal System), प्रजनन क्षमता, बच्चों के मानसिक विकास पर गंभीर परिणाम डालती है।

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
फसल अवशेषों के जलने से निकलने वाला धुआं मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। इसका सबसे अधिक असर बच्चों और बुजुर्गों पर देखा जाता है जहां PM(Particular matter) 2.5 और NOx जैसे प्रदूषक अस्थमा, एलर्जी और फेफड़ों की सूजन जैसी समस्याओं का कारण बनते हैं। इसके अलावा धुएं में मौजूद डायऑक्सिन और बेंजीन जैसे जहरीले रसायन सभी आयु वर्ग के लोगों में कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं। शोधों में यह भी पाया गया है कि जहरीले कार्बनिक यौगिक विशेषरूप से पुरुषों में हार्मोन संतुलन को प्रभावित करते हैं। वहीं इन धातुओं और विषैली गैसों के संपर्क में आने से गर्भवती महिलाओं और भ्रूण के विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लंबे समय तक इस प्रदूषण के संपर्क में रहने से सामान्य जनसंख्या की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है जिससे लोगों में संक्रमण और बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

फसल अवशेषों का प्रबंधन

समाधान एवं विकल्प
फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए कई प्रभावी समाधान और विकल्प उपलब्ध हैं जिनका उपयोग करके खेतों में जैविक उर्वरता बढ़ाई जा सकती है और प्रदूषण को कम किया जा सकता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण तरीका है अवशेष समावेशन जिसमें अवशेषों को मिट्टी में मिलाकर जैविक कार्बन और उर्वरता में वृद्धि की जाती है। इसके अलावा हैप्पी, सीडर सुपर सीडर, रोटावेटर जैसी आधुनिक मशीनों का उपयोग करके बिना जलाए सीधे बुवाई की जा सकती है जिससे समय, लागत और पर्यावरणीय क्षति तीनों में कमी आती है। अवशेषों का उपयोग कम्पोस्ट और वर्मीकम्पोस्ट निर्माण में भी किया जा सकता है जिससे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद प्राप्त होती है। वहीं जो किसान ऊर्जा के विकल्प ढूंढ रहे हैं उनके लिए बायोगैस, ब्रिकेट्स और पेलेट्स निर्माण एक उत्कृष्ट विकल्प है जो न केवल नवीकरणीय ऊर्जा प्रदान करता है बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत भी बनता है। अतिरिक्त रूप से फसल अवशेषों का उपयोग, मशरूम उत्पादन और मिश्रित पशु आहार बनाने में भी किया जा सकता है जिससे किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलता है।

सरकार समाज और तकनीक की भूमिका
फसल अवशेष प्रबंधन की चुनौती केवल किसानों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि इसमें सरकार, समाज, तकनीकी संस्थान और शोध संगठनों की संयुक्त भागीदारी आवश्यक है। सरकार द्वारा पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी, वित्तीय सहायता और विभिन्न योजनाओं का विस्तार किया जा रहा है जिससे किसान आधुनिक तकनीकों तक आसानी से पहुंच बना सकें। साथ ही हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, स्ट्रॉ रीपर और बायोमास कलेक्शन मशीनों जैसे स्मार्ट कृषि उपकरणों का प्रसार फसल अवशेषों के प्रबंधन को व्यावहारिक और सरल बनाता है। इन तकनीकों के प्रभावी उपयोग हेतु किसानों को प्रशिक्षण, कार्यशालाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान करना भी अत्यंत आवश्यक है।इसके अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर बायोरिसोर्स कलेक्शन सेंटरों की स्थापना न केवल फसल अवशेषों की बिक्री और प्रसंस्करण को सुगम बनाएगी बल्कि इसे किसानों के लिए आय का नया स्रोत भी बना सकती है। इस दिशा में कृषि विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और औद्योगिक संगठनों का सहयोग तकनीकी नवाचार, नीति-निर्माण और व्यवहारिक समाधान उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

भविष्य की दिशा: स्मार्ट और सतत कृषि प्रणाली
फसल अवशेषों को जलाने की परंपरागत प्रथा के स्थान पर यदि वैज्ञानिक तकनीकी और पर्यावरण-अनुकूल विधियों को अपनाया जाए तो कृषि क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आधुनिक मशीनरी, जैविक प्रबंधन तकनीकों और नवीकरणीय ऊर्जा समाधानों के माध्यम से अवशेषों का पुन: उपयोग न केवल पर्यावरण संरक्षण में मदद करता है बल्कि कृषि को अधिक स्मार्ट, लाभकारी और टिकाऊ बनाता है।ऐसी तकनीकें अपनाने से कई सकारात्मक परिवर्तन संभव हैं। सबसे पहले यह कदम कार्बन फुटप्रिंट में उल्लेखनीय कमी लाएगा जिससे वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की तीव्रता नियंत्रित होगी। दूसरा फसल अवशेषों का उपयोग पशु चारा, ऊर्जा या जैविक खाद के रूप में करने से किसानों की आय में वृद्धि होगी और पारंपरिक कृषि से परे नए आर्थिक अवसर उत्पन्न होंगे। इसके साथ ही जैविक पदार्थों के पुनर्चक्रण से मिट्टी की उर्वरता, संरचना और सूक्ष्मजीव गतिविधि में सुधार होगा जिससे फसल उत्पादन अधिक सुरक्षित और पौष्टिक बनेगा। अंततः इन उपायों से खाद्य एवं पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित होगी और कृषि क्षेत्र जलवायु स्मार्ट प्रथाओं की ओर अग्रसर होगा।

निष्कर्ष
यद्यपि फसल अवशेषों को जलाना किसानों के लिए एक त्वरित और श्रम बचत समाधान प्रतीत होता है परंतु इसके दीर्घकालिक प्रभाव अत्यंत हानिकारक और अपरिवर्तनीय हो सकते हैं। यह न केवल पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा देता है बल्कि मिट्टी की उर्वरता जलवायु संतुलन, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। इसलिए अब समय आ गया है कि पराली को समस्या नहीं बल्कि एक मूल्यवान संसाधन के रूप में देखा जाए।

यदि उचित प्रबंधन एवं वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाए तो यही फसल अवशेष बहुमूल्य विकल्पों में परिवर्तित हो सकते हैं। इन्हें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत जैसे बायोगैस ब्रिकेट्स एवं पेलेट्स के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त फसल अवशेष पशु आहार विभिन्न कृषि एवं बायोप्रोसेसिंग उद्योगों के कच्चे माल तथा जैविक एवं पोषक तत्वों से भरपूर उर्वरक के रूप में अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं।

“पराली कचरा नहीं अवसर है पराली समस्या नहीं संसाधन है बस दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है।“