डॉ. पी. मुवेंथन (वरिष्ठ वैज्ञानिक), डॉ. गुंजन झा (वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, राजनांदगांव),
सुमन सिंह (वरिष्ठ अनुसंधान सहायक, एनएएसएफ परियोजना), एवं डॉ. हेम प्रकाश वर्मा (यंग प्रोफेशनल, एफएफपी परियोजना)
भाकृअनुप. - राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, बारोंडा, रायपुर (छत्तीसगढ़)
चना (साइसर एरिएटिनम एल.) भारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण दलहनी फसल है, जिसे देश के लगभग सभी राज्यों में रबी मौसम में उगाया जाता है। यह फसल न केवल किसानों की आमदनी का प्रमुख स्रोत है, बल्कि पोषण की दृष्टि से भी अत्यंत मूल्यवान है। चना के दानों में लगभग 20–22 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है, जो शाकाहारी जनसंख्या के लिए पौष्टिक आहार का एक प्रमुख आधार है। इसके अतिरिक्त चना फसल अपनी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं के सहजीवन के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि होती है और अगली फसलों की उत्पादकता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।खेती के आर्थिक और पोषणीय महत्व के बावजूद, चना फसल कई रोगों के कारण भारी नुकसान झेलती है। इन रोगों में से सबसे गंभीर और विनाशकारी रोग है मुरझान या विल्ट रोग (Wilt Disease)। यह रोग देश के लगभग सभी चना उत्पादन क्षेत्रों में पाया जाता है और यदि इसका नियंत्रण समय पर न किया जाए तो खेत की 50 से 100 प्रतिशत तक फसल को नष्ट कर सकता है। मुरझान रोग मुख्यतः फफूंदजनित होता है और यह पौधे की जड़ों के माध्यम से संक्रमण फैलाकर धीरे-धीरे पूरे पौधे को मुरझा देता है।
इस रोग की भयावहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार खेत में यह रोग स्थापित हो जाए तो कई वर्षों तक मिट्टी में जीवित रह सकता है, जिससे अगली फसलों पर भी खतरा बना रहता है। इसलिए, किसानों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे इस रोग की पहचान, कारण और नियंत्रण के उपायों के बारे में पूर्ण जानकारी रखें ताकि समय पर प्रभावी प्रबंधन करके फसल की रक्षा की जा सके और उत्पादन में स्थिरता लाई जा सके।
रोग का कारण
चना में मुरझान रोग एक फफूंदजनित रोग है, जो फ्यूज़ेरियम ऑक्सीस्पोरम एफ. एस. पी. सिसेरी नामक रोगजनक फफूंद से होता है। यह फफूंद मिट्टी जनित रोगजनक है, जो पौधे की जड़ों के माध्यम से प्रवेश करता है और संवहन ऊतकों को अवरुद्ध कर देता है। इसके परिणामस्वरूप पौधे की जड़ों से जल और पोषक तत्वों का प्रवाह बाधित हो जाता है, जिससे धीरे-धीरे पौधा मुरझाने लगता है।
यह फफूंद अत्यंत दृढ़ स्वभाव की होती है और मिट्टी में कई वर्षों (5–6 वर्ष तक) तक निष्क्रिय अवस्था में जीवित रह सकती है। रोगजनक का प्रसार मुख्यतः संक्रमित बीज, मिट्टी, फसल के अवशेष, और सिंचाई जल के माध्यम से होता है। एक बार खेत में यह फफूंद स्थापित हो जाए, तो यह फसल चक्रीकरण न करने की स्थिति में बार-बार संक्रमण देती रहती है।इसके अलावा, उच्च तापमान (24–30°C), नमी की कमी, जल निकास रहित भारी मिट्टी, तथा लगातार चना या दलहनी फसलों की बुवाई इस रोग के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।
रोग के लक्षण
- प्रारंभिक लक्षण – फसल की आरंभिक अवस्था में, विशेषकर 25–40 दिन बाद, पौधे की निचली पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं और धीरे-धीरे ऊपर की ओर पीलीपन बढ़ता है। प्रभावित पौधों की वृद्धि रुक जाती है, तथा पत्तियाँ सिकुड़ने और झड़ने लगती हैं।
- मुरझाना – धीरे-धीरे पूरा पौधा मुरझाकर झुक जाता है। प्रारंभ में यह मुरझान केवल दिन के समय दिखाई देता है, किंतु रोग बढ़ने पर पौधा स्थायी रूप से मुरझा जाता है।
- जड़ों पर लक्षण – यदि संक्रमित पौधे की जड़ को बीच से काटा जाए तो उसका अंदरूनी भाग भूरा या काला दिखाई देता है, जो रोगजनक फफूंद के संवहन ऊतकों में प्रवेश करने का स्पष्ट संकेत है। कभी-कभी जड़ों पर सूक्ष्म सफेद फफूंदी जैसी वृद्धि भी दिखाई देती है।
- फूल और फलन अवस्था में प्रभाव – मुरझान का प्रकोप प्रायः फूल आने और दाना बनने के समय अधिक देखा जाता है, जब पौधे को अधिक पोषक तत्व और जल की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में पौधों का अचानक सूख जाना आम बात है।
- खेत में रोग का वितरण – खेत में रोगग्रस्त पौधे टुकड़ों-टुकड़ों में दिखाई देते हैं। कुछ स्थानों पर पूरा झुंड मुरझा जाता है, जबकि आस-पास के पौधे सामान्य रहते हैं, जिससे खेत का पैटर्न असमान दिखाई देता है।
- अंतिम अवस्था – अंततः रोगग्रस्त पौधे पूरी तरह सूख जाते हैं, जबकि उनकी जड़ें मिट्टी में जमी रहती हैं। फली बनना रुक जाता है और दाने सिकुड़ जाते हैं, जिससे उपज में भारी गिरावट आती है।
रोग के अनुकूल परिस्थितियाँ
चना का मुरझान रोग कुछ विशेष जलवायु एवं मृदा परिस्थितियों में तेजी से फैलता है। फफूंद के विकास और रोग के प्रकोप के लिए निम्नलिखित स्थितियाँ अनुकूल मानी जाती हैं—
1. तापमान: रोगजनक फफूंद के लिए 24–30°C तापमान सर्वाधिक अनुकूल होता है। इस सीमा के भीतर फफूंद तेजी से बढ़ती है और पौधे में संक्रमण करती है।
2. मृदा की नमी: अत्यधिक या बहुत कम नमी — दोनों ही स्थितियाँ रोग को बढ़ावा देती हैं। विशेषकर, कम नमी वाली हल्की सूखी मिट्टी में पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं, जिससे संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।
3. भारी तथा जल निकास रहित मिट्टी: ऐसी मिट्टियों में जलजमाव होने से जड़ों का श्वसन रुक जाता है, जिससे पौधा कमजोर होता है और रोगजनक को प्रवेश का अवसर मिल जाता है।
4. फसल का बार-बार एक ही खेत में बोना: यदि लगातार कई वर्षों तक एक ही खेत में चना या अन्य दलहनी फसलों की खेती की जाए, तो मिट्टी में फफूंद का संक्रमण बढ़ जाता है और रोग बार-बार प्रकट होता है।
5. संक्रमित बीजों का उपयोग: संक्रमित या बिना उपचार किए बीजों के माध्यम से फफूंद आसानी से खेत में प्रवेश कर जाती है।
6. जैविक अवशेषों का खेत में रहना: पिछले वर्ष के संक्रमित पौधों के अवशेषों को खेत में छोड़ देना भी रोग के स्थायित्व और पुनः संक्रमण का प्रमुख कारण है।
7. असंतुलित पोषण: नाइट्रोजन की अधिकता तथा फास्फोरस या पोटाश की कमी वाली मिट्टी में पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, जिससे रोग का प्रकोप बढ़ता है।
रोग के प्रसार के तरीके
1. संक्रमित बीजों के माध्यम से: फ्यूज़ेरियम फफूंद बीजों की बाहरी सतह या अंदरूनी भाग में छिपी रह सकती है। ऐसे बीज जब बोए जाते हैं तो अंकुरण के साथ ही रोग खेत में फैल जाता है।
2. फसल अवशेषों से: रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों में फफूंद की संरचनाएँ (क्लैमाइडोस्पोर) लंबे समय तक जीवित रहती हैं। अगली फसल की बुवाई पर ये संरचनाएँ अंकुरित होकर नए पौधों को संक्रमित करती हैं।
3. मिट्टी के माध्यम से: यह एक प्रमुख मिट्टी जनित रोग है। फफूंद कई वर्षों तक मिट्टी में जीवित रहकर अनुकूल परिस्थितियों में पुनः सक्रिय हो जाती है।
4. सिंचाई के पानी और औजारों द्वारा: संक्रमित खेत का पानी, औजार, या जुताई उपकरण यदि दूसरे खेतों में उपयोग किए जाएँ तो फफूंद उनके माध्यम से स्वस्थ खेतों में पहुँच सकती है।
5. वायु और कीटों द्वारा: यद्यपि यह रोग मुख्यतः मिट्टी जनित है, किंतु कभी-कभी हवा से उड़ने वाली धूल या कीटों द्वारा भी फफूंद के बीजाणु पास के पौधों तक पहुँच सकते हैं।
रोग नियंत्रण के उपाय
चना में मुरझान रोग का प्रभावी नियंत्रण तभी संभव है जब किसान कृषि, जैविक और रासायनिक उपायों का संयोजन अपनाएँ। इस रोग से निपटने के लिए केवल एक विधि पर्याप्त नहीं होती, बल्कि समन्वित (Integrated) दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। नीचे इसके विभिन्न उपायों का विस्तृत विवरण दिया गया है—
1. कृषि नियंत्रण
कृषि संबंधी उपाय मुरझान रोग के प्राथमिक नियंत्रण के लिए सबसे प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल विधियाँ हैं।
- फसल चक्रीकरण: चना फसल को एक ही खेत में लगातार बोने से बचें। इसे कम से कम 3–4 वर्ष के अंतराल पर बोएँ और बीच के वर्षों में धान, गेहूँ या मक्का जैसी गैर-दलहनी फसलें लें। इससे मिट्टी में रोगजनक फफूंद की मात्रा घटती है।
- रोगमुक्त बीज और खेत का चयन: हमेशा प्रमाणित, स्वच्छ एवं रोगमुक्त बीजों का उपयोग करें। खेत में पहले से मुरझान का इतिहास हो तो उस खेत में चना की बुवाई न करें।
- उचित जल निकास व्यवस्था: खेत में जलजमाव न होने दें क्योंकि जलभराव पौधों की जड़ों को कमजोर करता है और फफूंद के प्रवेश को बढ़ावा देता है।
- फसल अवशेष प्रबंधन: पिछले वर्ष की फसल के संक्रमित अवशेषों को खेत में छोड़ने की बजाय उन्हें जलाकर या गहराई में दबाकर नष्ट करें। इससे फफूंद की वृद्धि रुक जाती है।
- संतुलित उर्वरक प्रयोग: नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित अनुपात बनाए रखें। अत्यधिक नाइट्रोजन रोग की संवेदनशीलता बढ़ा सकती है।
2. प्रतिरोधी किस्में
रोगरोधी किस्मों का चयन रोग नियंत्रण का सबसे सस्ता और स्थायी तरीका है। वर्तमान में कई ऐसी किस्में विकसित की गई हैं जो मुरझान रोग के प्रति सहनशील हैं, जैसे -
जे.जी. 315, जे.जी. 74, जे.जी. 130, आई.सी.सी.वी. 10, पूसा 362, वैभव, जे.ए.के.आई. 9218 और डब्ल्यू.आर.315। इन किस्मों को उन क्षेत्रों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए जहाँ रोग का प्रकोप पहले से मौजूद है।
3. बीज उपचार
बुवाई से पहले बीज उपचार करने से रोग का प्रारंभिक संक्रमण रोका जा सकता है।
- रासायनिक उपचार: बीज को कार्बेन्डाजिम 50% डब्ल्यूपी या थिरम (2–3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से उपचारित करें।
- जैविक उपचार: पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में बीज को ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियानम या ट्राइकोडर्मा विरिडे (4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से उपचारित किया जा सकता है।
- संयुक्त उपचार: पहले बीज को जैविक फफूंदनाशी से और फिर राइजोबियम से उपचार करने से रोग नियंत्रण और नाइट्रोजन स्थिरीकरण दोनों में लाभ मिलता है।
4. जैविक नियंत्रण
जैविक नियंत्रण मृदा जनित रोगों के प्रबंधन में अत्यंत उपयोगी और टिकाऊ तरीका है।
- खेत की तैयारी के समय ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियानम को 2.5 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद (50 किग्रा) के साथ अच्छी तरह मिलाकर मिट्टी में डालें।
- यह लाभकारी फफूंद रोगजनक फ़्यूज़ेरियम ऑक्सीस्पोरम के साथ प्रतिस्पर्धा कर उसे नष्ट कर देती है और पौधों की जड़ प्रणाली को मजबूत बनाती है।
- नीम की खली 200 किग्रा/हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाना भी फफूंद के विकास को रोकने में सहायक होता है।
5. रासायनिक नियंत्रण
- यदि रोग का प्रकोप अत्यधिक हो, तो कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी या थायोफेनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी का 0.1% घोल बनाकर मिट्टी का उपचार करें।
- रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से दूर नष्ट करें ताकि संक्रमण अन्य पौधों में न फैले।
- रोग के बार-बार होने की स्थिति में फसल के प्रारंभिक विकास चरण में कार्बेन्डाजिम के छिड़काव या मिट्टी उपचार पर विचार किया जा सकता है।
6. एकीकृत रोग प्रबंधन
चना मुरझान रोग को दीर्घकालिक रूप से नियंत्रित करने के लिए विभिन्न तकनीकों का समन्वित उपयोग सबसे प्रभावी माना जाता है—
- रोगमुक्त एवं प्रमाणित बीज का उपयोग।
- फफूंदनाशी बीज उपचार + जैविक एजेंट (ट्राइकोडर्मा) का प्रयोग।
- रोगरोधी किस्मों का चयन।
- उचित फसल चक्रीकरण और जल निकास व्यवस्था।
- संतुलित उर्वरक एवं मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन।
- खेत में नियमित निरीक्षण और रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखने पर तुरंत उपाय।
निष्कर्ष
चना की उत्पादकता को बनाए रखने के लिए मुरझान रोग का समुचित प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। केवल रासायनिक उपायों पर निर्भर रहने के बजाय कृषि, जैविक और एकीकृत तकनीकों का संयोजन अपनाकर इस रोग को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। किसानों को चाहिए कि वे फसल की प्रारंभिक अवस्था से ही नियमित निगरानी रखें, बीज उपचार को अनिवार्य रूप से अपनाएँ, तथा रोगरोधी किस्मों का उपयोग करें। ऐसा करने से न केवल उपज हानि को रोका जा सकता है, बल्कि टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।

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