डाॅ. निशी केशरी, सह प्राध्यापक
डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा

परवल एक प्रकार की सब्जी है जो सब्जियों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी मिठाई भी बनती है जो काफी प्रचलित है। यह एक लत्तीदार सब्जी है और इसे लत्ती की कटिंग से लगाया जाता है। परवल में सूत्रकृमि की समस्या से किसान काफी परेशान हैं। किसान इसकी खेती लगातार एक ही खेत में बहुत सालों तक करते रहते हैैं जिससे सूत्रकृमि की समस्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती है क्योंकि ये सूत्रकृमि एक जीवन चक्र में बहुत ज्यादा अंडे देते हैं (300-500 प्रति मादा) और फसल के लगातार खेत में होने से इनकी कई पीढ़ियाँ तैयार हो जाती हैंै। इसके कारण नयी फसल तुरंत संक्रमित हो जाती है। यह बीमारी भारत में जहाँ भी फसल उगायी जाती है, मिलती है। यह सूत्रकृमि सभी प्रकार की मिट्टी में अपना जीवन चक्र चला लेते हैं। अगर मिट्टी में परजीवी फफूँद भी हंै तो यह सूत्रकृमि उसके साथ परस्पर क्रिया करके बीमारी की आक्रांतता को बढ़ा देता है। इसके कारण पैदावार मेें 40 से 50 प्रतिशत की कमी अनुमानित की गयी है जो 80 से 90 प्रतिशत तक भी कभी-कभी पहुँच जाती है जब लता लगाने के समय मिट्टी में 2 से 3 सूत्रकृमि या इससे ज्यादा प्रति ग्राम मिट्टी में पहले से मौजूद हों। आक्रांत जड़ों की सतह पर मादा सूत्रकृमि अंडों के समूह को निकालते हैं जिससे धीरे-धीरे सूत्रकृमि के बच्चे निकलते हैं और इनकी द्वितीय अवस्था काफी संक्रामक होती है जो नयी स्वस्थ जड़ों को भी आक्रांत कर देते हैं।

जड़गाँठ सूत्रकृमि द्वारा परवल में होने वाले लक्षण-
  • पौधों का कमजोर होना
  • पौधों में बौनापन का होना
  • पत्त्यिों का पीला हो जाना
  • लत्तियों का पतला हो जाना
  • पत्त्यिों का सूख कर गिरना
  • डालियों का उपर से नीचे की तरफ सूखना
  • जड़ों में छोटे से बड़े गाँठों का बनना
  • डालियों में भी छोटे-छोटे गाँठों का बनना
  • सूत्रकृमि ग्रसित पौधे फफूँद और जीवाणु जनित बीमारियों से रोगग्राही हो जाते हैं
  • नयी डालियों का नहीं निकलना
  • जड़गाँठ का आकार फसलों के विभिन्न विकास स्तर पर अलग-अलग होता है
  • जड़गाँठों का मिट्टी फाड़कर सतह पर आ जाना
  • पौधों की बढ़वार का रूक जाना
  • पत्त्यिों में चमक का कम हो जाना
  • पत्त्यिों का सिकुड़ना, छोटा होना और कड़ा हो जाना
  • फलों का छोटा हो जाना, जल्दी पीला हो जाना
  • फलों का सूखना
  • पौधों का दिन के समय सूखने लगना
  • फूलों का कम आना



जड़गाँठ सूत्रकृमि द्वारा परवल में होने वाले बीमारी का निदान

1. बीमारी रहित परवल के बिचड़ों का इस्तेमाल- 
लताओं को लगाने से पहले उसे असंक्रमित कर लें तथा खेतों में भी जहाँ लगाने जा रहे हैं, उस मिट्टी की जाँचकर उसे सूत्रकृमि रहित कर सुनिश्चित कर लें।

2. फसलचक्र- 
गैर मेजबान फसल तथा प्रतिरोधी फसलों द्वारा किया जाता है। फसल चक्र काफी असरदार प्रबंधन है किन्तु यह तभी कारगर होता है जब इसे लता को लगाने से पहले किसी और फसल को लगाया जाये। सामान्यतया सरसों की फसल को लगाना काफी फायदेमंद होता है।

3. खरपतवार रहित फसल लगाना

4. फसल की कटाई के बाद आक्रांत जड़ों एवं जड़गाँठों को जला देना- कटाई के उपरांत आक्रांत जड़ों एवं लत्त्यिों को हटाकर 2 से 3 बार गहरी जूताई करना सूत्रकृमि की संख्या को काफी कम कर देता है। ये सूत्रकृमि सूरज की गर्मी तथा हवा के संपर्क में आकर मर जाते हैं या सूख जाते हैं जिससे अगली पीढ़ी की संख्या कम हो जाती है।

5. मृदा सौर्यीकरण (खेतों की गहरी जुताई)- सूत्रकृमि प्रभावित खेतों में अप्रैल-जून के महीने में 3 से 4 बार गहरी जूताई कर मिट्टी को पलटना तथा उसको तेज धूप लगने देना चाहिए। प्रत्येक 10 से 15 दिनों पर इस प्रक्रिया को दोहराना चाहिए। बार-बार मिट्टी पलटने से सूत्रकृमि मिट्टी की सतह पर आ जाते हैं तथा तेज धूप से मर जाते हैं। इस विधि से सूत्रकृमि की जनसंख्या 50 से 70 प्रतिशत तक कम हो जाती है।

6. प्रतिरोधी प्रजातियों का इस्तेमाल

7. कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दानेदार दवा का 1 किलोग्राम सक्रिय तत्व (33 किलो प्रति हेक्टेयर) का इस्तेमाल जड़ों में करने से फायदा होता है।

8. पौधों को सही समय पर खाद, पानी इत्यादि देने से उनमें सूत्रकृमि के आक्रमण के प्रतिसहिष्णुता बढ़ती है और हानि कम होती है।

9. कार्बनिक पदार्थों का इस्तेमाल- कार्बनिक पदार्थों, जैसे, नीम, करंज, महुआ आदि अखाद्य खल्लियों का इस्तेमाल, औषधीय पौधों के पत्तों को छोटे-छोटे टुकड़े कर मिट्टी में दबाना। यह उपाय काफी सस्ता और असरकारक है क्योंकि इसके सड़ने की प्रक्रिया के दौरान फिनाॅलिक यौगिक बनते हैं जो पौधों के आस-पास पाये जाने वाले हानिकारक जीवों का विनाश करते हैं।