डॉ. द्विवेदी प्रसाद, सहायक प्राध्यापक (सस्य विज्ञान)
पं. शिवकुमार शास्त्री कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, राजनांदगांव (छ.ग.)

अलसी रबी मौसम में ली जाने वाली एक प्रमुख फसल है। यह सूखा को सहन करती है, इस कारण वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त है। अलसी की फसल व्यापक स्तर पर बीजों की प्राप्ति के लिए की जाती है, जिनसे तेल निकाला जाता है। अलसी के बीज में तेल की मात्रा 33-47 प्रतिशत तक होती है। तेल के अतिरिक्त अलसी का उपयोग खाने में, रंग-रोगन, जल-रोधक फैब्रिक आदि में किया जाता है।

भूमि का चुनाव एवं खेत की तैयारी
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अलसी की फसल के लिए गहरी काली मिट्टी, जिसकी जल धारण क्षमता अच्छी हो एवं उत्तम जल निकास वाली हल्की अम्लीय भूमि जिसका पीएच मान 5.5 से 6.0 तक हो उपयुक्त होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र में हल्की भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। मिट्टी को अच्छी तरह से जुताई कर भुरभुरा करना चाहिए।

बीज उपचार
बीज जनित रोगों से बचाव हेतु 2 से 3 ग्राम थायरम या बाविस्टीन प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। इसके बाद पीएसबी कल्चर 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करना चाहिए।

बुवाई का समय
असिंचित क्षेत्रों में बुवाई अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह से अंतिम सप्ताह तक की जा सकती है। सिंचित क्षेत्र में एवं अधिक ठण्ड वाले स्थानों में नवंबर के प्रथम सप्ताह तक बुवाई कर सकते है।

बीज दर/बुवाई की विधि
सामान्यतः असिंचित क्षेत्रों में बीज की मात्रा 30 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर एवं सिंचित क्षेत्रों हेतु बीज दर 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, उतेरा विधि से बुवाई हेतु 40 कि.ग्रा बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त है। अलसी की बुवाई हेतु कतार से कतार की दूरी 25 से 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 5-7 से.मी. रखें तथा बीज की बुवाई 3-4 से.मी. गहराई पर करें। अलसी की बुवाई उतेरा विधि से धान के खेत में धान के कटाई करने से पहले या कटाई के बाद किया जाता हैं।

अलसी की प्रमुख किस्में

किस्म

अवधि (दिनों में)

औसत उपज (क्वि./हे.)

विशेषताएं

जे.एल.-23

120-125

9-10

उक्ठा, दहिया, गेरूआ रोग प्रतिरोधी एवं तेलांश 43 प्रतिशत

जे.एल.-9

115-125

9-10

उक्ठा एवं पाउडरी मिल्ड्यू निरोधक

जे.एल.-17

115-125

9-10

पाउडरी मिल्ड्य एवं उक्ठा निरोधक

पदमनी

120-125

8-12

रस्ट एवं पाउडरी मिल्ड्यू निरोधक, असिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त

आर.-552

115-120

8-10

भूरा मध्यम दाना, उक्ठा, गेरूआ एवं पाउडरी मिल्ड्यू निरोधक, तेलांश 44 प्रतिशत 

किरन

120-125

8-12

उक्ठा, गेरूआ एवं पाउडरी मिल्ड्यू निरोधक, असिंचित सिंचित क्षेत्रों हेतु उपयुक्त, तेलांश 43 प्रतिशत

टी.-397

120-125

8-10

उक्ठा एवं गेरूआ रोग और सूखा के सहनशील, तेलांश 44 प्रतिशत

शेखर

130-140

9-15

चमकदरा भूरा, चूर्णी फफूँद, रतुआ और उक्ठा रोधी, कली मक्खी सहनशील, तेलांश 43 प्रतिशत

इंदिरा अलसी-32 (आर.एल.सी.-81)

110-115

8-12

बौना, गहरा-भूरा, पाउडरी मिल्ड्यू निरोधक तथा आल्टरनेरिया ब्लाइट  के लिए साधारण सहिष्णु, बारानी (असिंचित), सिंचित उतेरा के लिए उपयुक्त, तेलांश 39 प्रतिशत

कार्तिका

100-105

12-13

बौना, हल्का-भूरा, पाउडरी मिल्ड्यू निरोधक तथा उक्ठा, गेरूआ और आल्टरनेरिया ब्लाइट एवं कली मक्खी के लिए साधारण सहिष्णु, तेलांश 43 प्रतिशत

दीपिका (आर.एल.सी.-78)

110-115

12-14

मध्यम ऊँचाई, उक्ठा, गेरूआ और आल्टरनेरिया ब्लाइट के लिए साधारण प्रतिरोधी, अर्धसिंचित तथा उतेरा के उपयुक्त, तेलांश 41 प्रतिशत

इन्द्रावती अलसी (आर..एल.सी.-92)

110-115

12-14

उक्ठा, गेरूआ और पाउडरी मिल्ड्यू रोग के लिए प्रतिरोधी तथा आल्टरनेरिया ब्लाइट एवं कली मक्खी के लिए सहनशील, शीघ्र समय देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त, 54 प्रतिशत ओमेगा-3, तेलांश 40 प्रतिशत

आर.एल.सी.-133 (.. अलसी 1)

100-104

8-12

वर्षा आधारित, शीघ्र देरी से बुवाई हेतु

आर.एल.सी.-143 (उतेरा अलसी)

115-120

5-6

उतेरा हेतु उपयुक्त, पाउडरी मिल्ड्यू एवं अल्टरनेरिया ब्लाइट, कली मक्खी रस्ट ब्लाइट हेतु प्रतिरोधी

 
खाद-उर्वरक
अलसी की खेती के लिए सबसे पहले मृदा परिक्षण कर लेना चाहिए उसके पश्चात ही खाद एवं उर्वरक डालना चाहिए। गोबर की खाद 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर जुताई के पूर्व डालना चाहिए। असिंचित अवस्था में नत्रजन 30 कि.ग्रा., स्फुर 20 कि.ग्रा. तथा पोटाश 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से दें। सिंचित स्थिति में नत्रजन 60 कि.ग्रा., स्फुर 40 कि.ग्रा. तथा पोटाश 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से दें। नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर, पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय दें एवं शेष आधी मात्रा प्रथम सिंचाई पर देवें। यदि मिट्टी में गंधक की कमी हो तो 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर डाले।

सिंचाई
अलसी की अधिक पैदावार के लिये दो सिंचाई की अनुशंसा की जाती है। पहली सिंचाई बुवाई के 35-40 दिन (शाखा बनते समय) एवं दूसरी सिंचाई 65-75 दिनों (दाना भरते समय) के बाद करना उत्पादन के लिए लाभदायक होता है। ध्यान रहें सिंचाई के पूर्व फसल की निंदाई-गुड़ाई हो जाना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण
अलसी की फसल में खरपतवार से 10 से 15 प्रतिशत नुकसान होता है। अलसी की फसल में परजीवी खरपतवार अमरबेल से फसल को सबसे अधिक नुकसान होता है, प्रभावित फसलों को जमीन की सतह से काटने पर अमरबेल का प्रकोप कम हो जाता है। अलसी के प्रमुख खरपतवार बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, जंगली गाजर, सत्यानाशी आदि है। इन खरपतवार के नियंत्रण हेतु पेण्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर प्रति हेक्टेयर 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 2-3 दिनों के अन्दर समान रूप से छिड़काव करें।

रोग एवं कीट निदान

गेरूआ:- इस रोग से पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे बन जाते है एवं तना काला पड़ जाता है। इस रोग के निदान हेतु डायथेन एम-45 की 1 कि.ग्रा. से 1.5 कि.ग्रा. दवा 600 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति 15 दिन के अन्तराल से प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने से नियंत्रण होता है।

पाउडरी मिल्ड्य (भभूतिया रोग):- इसे बुकनी या दहिया रोग के नाम से भी जाना जाता है। इसके आक्रमण से पत्तियों पर सफेद चूर्ण फैल जाता है। इसके नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 80 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर लगभग 600-700 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

उक्ठा रोग:- उक्ठा रोग के नियंत्रण हेतु ट्राईकोडरमा विरिडी 1 प्रतिशत/ट्राईकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 4.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजशोधन कर बुवाई करना चाहिए।

गालमिज:- इस कीट का इल्ली (मैगट) फसल की खिलती कलियों के अन्दर पुंकेसर को खाकर नुकसान पहुँचाता हैख् जिससे फलियों में दाने नही बनतें है।

अलसी की इल्ली:- इस कीट की इल्ली अवस्था हानिकारक होती है। नव विकसित इल्लियॉ पत्तियों की बाहरी त्वचा को खाकर पत्तियों को जालीदार कर देती है। पूर्ण विकसित इल्लियां पत्तियों को काटकर खाती है। अधिक प्रकोप होने पर पौधे पत्तीविहीन हो जाते है। इसके नियंत्रण हेतु फसल की बुवाई समय पर करें एवं कार्बरिल 50 डब्ल्यू.पी. दवा 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

जड़भक्षी दीमक:- यह पौधों की जड़ों को नुकसान पहुॅचाता है जिससे पौधे सूख जाते है। प्रकोपित पौधे खींचने पर आसानी से निकल जाते है। इसके नियंत्रण के लिए निम्न उपाये करें-
  • गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
  • अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करें।
  • खेत तैयार करते समय 40-50 किलोग्राम नीम खली/हे. मिलाएं।
  • बीज उपचार क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. से 450 मि.ली. प्रति क्विं. बीज दर से करें।

अर्ध कुण्डलक इल्ली:- इस कीट की इल्ली अवस्था हानिकारक होती है, जो पौधों की पत्तियों को खाकर नुकसान पहुॅचाती है तथा बाद में कलियों को भी नुकसान पहुॅचाती है। इसके नियंत्रण के लिए इल्ली अवस्था को हाथ से पकड़कर नष्ट करें। अकाश प्रपंच का उपयोग कर प्राैंढ़ कीटों को नष्ट करें एवं क्विनालफास 25 ई.सी. की 750-1000 मि.ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

कटाई एवं गहाई
जब फसल के कैप्सूल भूरे रंग के हो जाये एवं फसल की पत्तियॉ अच्छी तरह से सूख जाये उस समय फसल को काटना चाहिए एवं खलियान में एक-दो दिन सुखाकर गहाई करें।

उपज
अलसी की उपज 3-5 क्विंटल/हेक्टेयर, (उतेरा), 7-9 क्विंटल/हेक्टेयर (असंचित) एवं 15-20 क्विंटल/हेक्टेयर (संचित) प्राप्त होती हैं।