दुर्गेश्वरी,रामेश्वर, छत्रपाल सिंह पुहुप
पी.एच.डी. स्कालर, इं.गाँ.कृ.वि.वि., रायपुर (छ.ग.)
एस.आर.एफ. (चिराग परियोजना), संचालनालय अनुसंधान सेवायें,
इं.गाँ.कृ.वि.वि., रायपुर (छ.ग.)

परिचय
चना एक प्रमुख दलहनी फसल है। चने को दालों का राजा कहा जाता है। पोषक मान की दृष्टि से चने के100 ग्राम दाने में औसतन 11 ग्राम पानी, 21.1 ग्राम प्रोटीन, 4.5 ग्रा. वसा, 61.5 ग्रा. कार्बोहाइड्रेट, 149 मिग्रा. कैल्सियम, 7.2 मिग्रा. लोहा, 0.14 मिग्रा. राइबोफ्लेविन तथा 2.3 मिग्रा. नियासिन पाया जाता है। भारत में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राज्यस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब आदि मुख्य चने उत्पादक राज्य हैं।

चने की उन्नत किस्में
जी.जी.-1, जे.जी.-16, वैभव, जे.जी.-130, जे.जी.जी.-1, जे.जी.-14, इंदिरा चना-1, जे.एस.सी.-55, जे.एस.सी.-56, बी.जी.डी.-128 (पूसा शुभ्रा), आई.पी.सी.के.-2002-29, ई.पी.सी. के.-2004-29, आई.पी.सी.-2066-77, छत्तीसगढ़ चना-2, छत्तीसगढ़ लोचन चना और छत्तीसगढ़ अक्षय चना, अवरोधी,।

बीज की मात्रा
  • देशी चने की किस्मों के लिए- 70-80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
  • काबुली चने की जातियों के लिए- 100-125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
  • देर से बुवाई करने पर- 90-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

बीज उपचार
चने की फसल पर फंफूदजनित रोगों से बचाव हेतु बुवाई के पूर्व कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से बीजोपचार करें। इससे बीज व भूमिजनित फफूँदयुक्त बीमारियों से सुरक्षा प्रदान होती है। बीज में जल्द अंकुरण के लिए राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए।

कल्चर का उपयोग
बीजोपचार के बाद बीज को राइजोबियम एवं पी.एस.बी. तरल जैव उर्वरक के प्रत्येक की 1 मिली. मात्रा -0.2 प्रतिशत, शक्कर / गुड के घोल से पतला कर प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें एवं ट्राइकोडर्मा 5 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। एक एकड़ के लिये आवश्यक बीज लें तथा पानी के हल्के छींटे देकर बीज को नम करें। फिर कल्चर को बीज पर छिड़ककर अच्छी तरह मिलायें। बीज छाया में सुखाएँ तथा शीघ्र ही बोयें। उपचारित बीज को धूप में न सुखाएँ।

बुवाई का समय
15 अक्टूबर से 30 नवम्बर तक

अंतरण व दूरी
चने की बुवाई पौध से पौध की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखने पर अच्छी उपज मिलती है।

चने की बुवाई की विधि
बुवाई के लिए किसान डिबलर की मदद ले सकते है, डिबलर के माध्यम से जो निशान बनते है वह पर बीज को 5 से 8 सेंटीमीटर की गहराई पर बोये, किसान अगर चाहे तो बड़े एरिया के लिए सीडड्रिल और देशी हल से बुवाई कर सकते है।

भूमि का चयन
चने की फसल कि उचित जल निकास वाली हल्की से भारी भूमियों में की जाती है, किन्तु कन्हार भूमि अधिक उपयुक्त है। इसके पौधों के विकास के लिए भूमिका पीएच 6.5 से 7.5 तक होना चाहिए।

भूमि की तैयारी
भूमि पलटने वाले हल से 1 जुताई के बाद 2-3 जुताइयाँ देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करें। हल जुताई करने के बाद खेत में पाटा चलाकर भूमि को समतल बना लेना चाहिए, किन्तु वातरंध्रयुक्त, ढेलेदार भूमि अधिक उपयुक्त है।

जलवायु व तापमान
चना एक ऐसी फसल है जो ठन्डे व शुष्क मौसम की फसल में आती है। चने के पौधे के बेहतर विकास के लिए अत्यधिक कम व मध्यम वर्षा वाले अथवा 65 से 95 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त हैं।

खाद व उर्वरक
चने के पौधे में नाइट्रोजन को वायुमंडल से अवशोषित करने के लिए रायजोबियम नाम का बेक्टेरिया होता है। चने में अंकुरण के बाद जीवाणुओं की ग्रंथियां बनने में 25-30 दिन लग जाते हैं, ऐसे में नाइट्रोजन की 15 से 20 किलोग्राम व 40 से 50 फॉस्फोरस तथा 40 से 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर देना चाहिए।

चने की फसल पर लगने वाले रोग व नियंत्रण

उकठा रोग
बीजों को बुवाई से पहले थायरम अथवा कार्बेन्डाजिम से उपचारित कर लेना चाहिए। चने की बुवाई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में ही करें। चने की खेती हेतु उकठा प्रतिरोधी किस्में जैसे अवरोधी: छत्तीसगढ़ चना-2, छत्तीसगढ़ लोचन चना और छत्तीसगढ़ अक्षय चना, जी.जी.-1, जे.जी.-16, वैभव, जे.जी.-130, जे.जी.जी.-1, जे.जी.-14, इंदिरा चना-1, जे.एस.सी.-55 इत्यादि का चयन करना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण
चने की फसल में खरपतवार की रोकथाम के लिए पहली गुड़ाई हाथों से या घास निकालने वाली चर खड़ी से बुवाई के 25-30 दिन बाद करें और जरूरत पड़ने पर दूसरी गुड़ाई बुवाई के 60 दिनों के बाद करें। खरपतवार की प्रभावशाली रोकथाम के लिए बुवाई से पहले पैंडीमैथलीन 1 लीटर प्रति 200 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 3 दिन बाद एक एकड़ में छिड़काव करें।

सिंचाई
चने की फसल में सिंचाई की उचित व्यवस्था होने पर बुवाई के बाद एक बार पानी दें। इससे बीज अच्छे ढंग से अंकुरित होते हैं और फसल की वृद्धि भी अच्छी होती है। दूसरी बार पानी फूल आने से पहले और तीसरा पानी फलियों के विकास के समय डालें। अगेती वर्षा होने पर सिंचाई देरी से और आवश्यकतानुसार करें। चने की अच्छी फसल के लिए बुवाई के 60 दिनों में खड़ी फसल में हाथों से खुटाई करें।

चने की कटाई
बुवाई के लगभग 120-130 दिन बाद जब चने के दाने सख़्त हो जाएँ। हसियाँ व दराती की सहायता से फ़सल काट लें।

चने की पैदावार उपज
  • असिंचित क्षेत्र में - 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • सिंचित क्षेत्र में - 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

भंडारण
सुखाने के पश्चात दानों में 10-12 प्रतिशत नमी रह जाने पर भंडार गृह में भंडारित कर दें।