खुशबू साहू * एवं सुन्ना दीप्ति**
कृषि विज्ञान केंद्र, गरियाबंद*,
कृषि विज्ञान केंद्र, जगदलपुर **(..)

गेंदे की दो प्रमुख प्रजातियाँ हैं, जिसका वैज्ञानिक वर्गीकरण इस प्रकार है —

सामान्य नाम: गेंदा

अंग्रेज़ी नाम: Marigold

वैज्ञानिक नाम : Tagetes Spp.

कुल (Family): Asteraceae

गेंदे की दो प्रमुख किस्में:

1. Tagetes erecta (अफ्रीकन गेंदा)

2. Tagetes patula (फ्रेंच गेंदा)

छत्तीसगढ़ की जलवायु और मिट्टी गेंदा की खेती के लिए अनुकूल है, जिससे यहाँ अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है। राज्य में गेंदा की खेती ग्रामीण किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनती जा रही है। इसकी खेती कम लागत, कम जोखिम और अधिक लाभ के कारण किसानों के बीच लोकप्रिय है।गेंदा का उपयोग धार्मिक कार्यक्रमों, विवाह समारोहों, सजावट, माला निर्माण तथा औषधीय एवं औद्योगिक उद्देश्यों के लिए व्यापक रूप से किया जाता है। इसकी मांग पूरे वर्ष बनी रहती है, विशेषकर त्योहारों और शादी के मौसम में।
औषधीय गुण

औषधीय गुणों के कारण गेंदा का एक खास महत्व है।कान दर्द में गेंदा के हरी पत्ती का रस कान में डालने पर दर्द दूर हो जाता है। खुजली तथा फोड़ा में हरी पत्ती का रस लगाने पर रोगाणु रोधी का काम करती है। ताजे फूलों का रस खूनी बवासीर के लिए भी बहुत उपयोगी होता है।

उपयुक्त जलवायु
गेंदे की खेती के लिए गर्म और समशीतोष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त होती है। यह फसल 18°C से 30°C तापमान में अच्छी तरह से विकसित होता है। 35°C से ऊपर का तापमान फूलों के आकार और संख्या को प्रभावित करता है । बहुत ज़्यादा ठंड, खासकर पाला, पौधों और फूलों दोनों को नुकसान पहुँचा सकते है। गेंदे के पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए 6-8 घंटे की धूप की आवश्यकता होती है।

मृदा का चयन
गेंदे की खेती के लिए दोमट, मटियार दोमट या बलुआर दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। 6.0 से 7.5 के बीच पीएच मान होनी चाहिए। मिट्टी में उचित जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि जलभराव वाली मिट्टी गेंदे की खेती के लिए उपयुक्त नहीं है।

गेंदा की उन्नत किस्में

1. अफ्रीकी गेंदा: इनके फूल बड़े और गुच्छेदार होते हैं, जो पीले, सुनहरे, और नारंगी रंग के होते हैं। ये गेंदा की अधिकतर किस्में 90-100 दिनों में फूल देना शुरू कर देती है। पौधे 75-85 सेमी ऊंचे होते हैं। उदाहरण में पूसा नारंगी, पूसा बसंती, अर्का अग्नि, अर्का बंगारा, अर्का भानु, पूसा बहार, पंजाब गेंदा -1,अफ्रीकन येलो है।

2. फ्रेंच गेंदा: इनके पौधे 1 मीटर तक ऊंचे होते हैं और कई शाखाओं से युक्त होते हैं। फूल गोलाकार और कई पंखुड़ियों वाले होते हैं, जो पीले और नारंगी रंग के होते हैं। फूलों का व्यास 7-8 से.मी. होता है। ये गेंदा की किस्में 75-85 दिनों में फूल देना शुरू कर देती है।उदाहरण में छत्तीसगढ़ गेंदा -1 ,पूसा दीप, चांदनी गेंदा, पूसा अर्पिता, काली गेंदा है।

खेत की तैयारी
  • प्रारंभिक गहरी जुताई: मोल्डबोर्ड हल से खेत की गहरी (20-25 सेमी) जुताई करें।
  • हैरो चलाना: ढेलों को और तोड़ने और खेत को समतल करने के लिए 2-3 बार हैरो चलाएँ।
  • जैविक पदार्थ मिलाना: अंतिम हैरो चलाते समय, अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) या कम्पोस्ट (20-25 टन प्रति हेक्टेयर) मिलाएँ। इससे मिट्टी की संरचना, जल धारण क्षमता और उर्वरता में सुधार होता है।

गेंदा के पौधे तैयार करना
गेंदा का प्रवर्धन बीज तथा वानस्पतिक भाग शाखा से कलम विधि द्वारा किया जाता है।

1. कलम विधि: गेंदा का प्रवर्धन कलम विधि द्वारा करने के लिए 6-8 सेंमी लम्बी कलम पौधे के उपरी भाग से लेते हैं कलम के निचले भाग को तिरछा काटते हैं।इसके बाद कलम को बालू में 2-3 सेंमी गहराई पर लगा देते हैं। कलम को बालू में लगा देने के 20-25 दिन बाद कलम में जड़ें बन जाती हैं। इस प्रकार वानस्पतिक प्रवर्धन विधि से पौधा बन कर रोपण हेतु तैयार हो जाता है।

2. नर्सरी की क्यारी की तैयारी एवं बीज की बुवाई: गेंदे के बीज सीधे खेत में नहीं बोए जाते, पहले उनकी पौध तैयार की जाती है। बीज एक हेक्टेयर के लिए लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। क्यारी में गेंदा बीज की बुवाई से पहले 2 ग्राम कैप्टान प्रति लीटर पानी में घोल कर सभी क्यारियों में ट्रेंच कर देना चाहिए, बेड 1-1.2 मीटर चौड़ी और 5-6 मीटर लंबी बनाएँ। जमीन से 15 सेमी ऊँची क्यारियाँ बनाएँ ताकि जल निकासी अच्छी हो। मिट्टी में गोबर की खाद मिलाएँ। बीजों को पंक्तियों में 5-10 सेमी की दूरी पर बोएँ और हल्की मिट्टी या छनी हुई खाद से ढक दें। बुवाई के बाद हल्की सिंचाई (फव्वारे से) करें। बीज 5 से 7 दिनों में अंकुरित हो जाते हैं।नर्सरी में बीज की बुवाई के एक माह बाद पौध रोपण के लिए तैयार हो जाते है।
लगाने की दूरी

किस्म के आधार पर पौधों के बीच की दूरी निम्न प्रकार रखें:
  • अफ्रीकन गेंदा (बड़ी किस्में): लाइन से लाइन 45 से.मी और पौधे से पौधा 40 से.मी।
  • फ्रेंच गेंदा (छोटी किस्में): लाइन से लाइन 30 से.मी और पौधे से पौधा 30 से.मी।

बुवाई का समय
  • खरीफ (जून से जुलाई) – 60 x 45 से.मी.
  • रबी (सितम्बर–अक्टूबर) – 45 x 45 से.मी.
  • जायद (फरवरी-मार्च) – 45 x 30 से.मी

खाद एवं उर्वरक
खेत की तैयारी से पहले 250 क्विंटल कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें । तत्पश्चात 120-150 किलो नत्रजन, 80-100 किलो फास्फोरस एवं 60-80 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग प्रति हैक्टेयर की दर से करें। नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अन्तिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधा रोपण के 30-40 दिन के अन्दर प्रयोग करें। जिंक या आयरन की कमी दिखे तो 0.5% जिंक सल्फेट या 0.5% फेरस सल्फेट का छिड़काव करें।फूल बनने के समय 19:19:19 (NPK) 1% घोल का स्प्रे करने से फूलों की संख्या बढ़ती है।

पिंचिंग
रोपाई के 30-40 दिन के अन्दर पौधे की मुख्य शाकीय कली को तोड़ देना चाहिए। इस क्रिया से यद्यपि फूल थोड़ा देर से आयेंगे, परन्तु प्रति पौधा फूल की संख्या एवं ऊपज में वृद्धि होती है। निकाई-गुड़ाई लगभग 15-20 दिन पर आवश्यकतानुसार निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन
खेत की नमी को देखते हुए 5-10 दिनों के अन्तराल पर गेंदा में सिंचाई करनी चाहिए। यदि वर्षा हो जाय तो सिंचाई नहीं करना चाहिए।

गेंदा में लगने वाले प्रमुख रोग
1. पाउडरी मिल्ड्यू (सफेद चूर्णी रोग) – (Oidium spp.)

लक्षण:
  • पत्तियों और तनों पर सफेद चूर्ण जैसा पदार्थ दिखाई देता है।
  • पत्तियाँ पीली होकर सूखने लगती हैं।

नियंत्रण:
  • घुलनशील गंधक (Sulphur 80% WP) 2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
  • कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर पानी में छिड़काव करें।

2.डैम्पिंग ऑफ (आर्द्र गलन रोग) – (Pythium / Rhizoctonia solani)

लक्षण:
  • बीज अंकुरित होने से पहले या बाद में पौध गल जाती है।
  • तने का निचला भाग सड़कर पतला हो जाता है।
  • नर्सरी में अधिक नुकसान होता है।

नियंत्रण:
  • बीज उपचार कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम/किग्रा बीज से करें।
  • नर्सरी में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें। मिट्टी में ट्राइकोडर्मा मिलाएँ।

3. जड़ गलन (रूट रॉट) – (Fusarium oxysporum)

लक्षण:
  • पौधे मुरझा जाते हैं। जड़ें काली होकर सड़ जाती हैं।
  • पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है।

नियंत्रण:
  • प्रभावित पौधों को उखाड़कर नष्ट करें।
  • कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम/लीटर से ड्रेंचिंग करें।

गेंदा में लगने वाले प्रमुख कीट

1. एफिड (Aphid)

लक्षण :
  • पत्तियाँ मुड़ जाती हैं और पीली पड़ती हैं
  • पौधे की वृद्धि रुक जाती है
  • चिपचिपा पदार्थ (हनीड्यू) निकलता है, जिस पर काली फफूंदी लग जाती है

नियंत्रण :
  • नीम तेल 5 मिली/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव
  • इमिडाक्लोप्रिड 0.3 मिली/लीटर पानी में छिड़काव

2. थ्रिप्स (Thrips)

लक्षण:
पत्तियों पर सिल्वर जैसी धारियाँ फूल छोटे और विकृत बनते हैं कलियाँ ठीक से नहीं खिलतीं

नियंत्रण:
  • स्पिनोसैड 0.5 मिली/लीटर पानी में छिड़काव
  • नीम आधारित कीटनाशी का प्रयोग

3. स्पोडोप्टेरा / तंबाकू इल्ली (Tobacco caterpillar)

कीट का नाम: Spodoptera litura

लक्षण:
  • पत्तियों में छेद
  • पूरी पत्ती कंकाल जैसी दिखाई देती है
  • रात में अधिक सक्रिय

नियंत्रण:
  • हाथ से अंडों व इल्लियों को नष्ट करें
  • इमामेक्टिन बेंजोएट 0.4 ग्राम/लीटर पानी

गेंदा के फूलों की तुड़ाई
गेंदा आमतौर पर रोपाई के लगभग 2.5 महीने बाद कटाई के लिए तैयार हो जाता है। फ्रेंच गेंदे के लिए, यह लगभग 1.5 महीने का समय ले सकता है, जबकि अफ्रीकी गेंदे के लिए 2 महीने लग सकते हैं।तोड़ने से पहले फूल पूरी तरह से खिले हुए और अपने अधिकतम आकार में होने चाहिए।अतः फूल की तोड़ाई साधारणतया सायंकाल में की जाती है। फूल को थोड़ा डंठल के साथ तोड़ना श्रेयस्कर होता है। फूल को कार्टून जिसमें चारों तरफ एवं नीचे में अखबार फैलाकर रखना चाहिए एवं ऊपर से फिर अखबार से ढँक कर कार्टून बन्द करना चाहिए।

उपज और भंडारण
अफ्रीकी गेंदे का 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर और फ्रेंच गेंदे का 10 से 12 टन प्रति हेक्टेयर उपज होता हैं। फूलों को ठंडी और हवादार जगह पर रखें। 8°C–10°C तापमान और 85–90% आर्द्रता उपयुक्त है।इस स्थिति में 2–3 दिन तक ताजगी बनी रहती है।

लाभ और बाजार
  • फूलों से सुगंधित तेल (Essential oil) निकाला जाता है। अगरबत्ती और इत्र में उपयोग।
  • फसल चक्र में अन्य फसलों (बैंगन) के साथ लगाने से कीट नियंत्रण में मदद।
  • फेस क्रीम, लोशन, साबुन और शैम्पू में उपयोग।
  • पोल्ट्री उद्योग में मुर्गियों के दाने में मिलाया जाता है ताकि अंडे की जर्दी गहरी पीली रहे।
  • कपड़ा, खाद्य पदार्थ और कॉस्मेटिक उत्पादों में प्राकृतिक रंग के रूप में उपयोग।