लेखराम वर्मा, अविनाश गौतम
सहायक प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, फिंगेश्वर, गरियाबंद

प्रस्तावनाः
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में धान की खेती का एक प्रमुख स्थान है। धान भारत में एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न है, जो लगभग 70 प्रतिशत लोगों के आहार का मुख्य घटक है। धान की खेती का क्षेत्रफल लगभग 45 मिलियन हेक्टेयर है, जबकि वार्षिक उत्पादन लगभग 120 मिलियन टन के है। यह भारत के कृषि आधार का सबसे बड़ा हिस्सा है, यह देश की खाद्य सुरक्षा का भी आधार है, खासकर उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार), दक्षिण भारत (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक) और पूर्वोत्तर राज्यों में इसका विस्तार अधिक है।

हाल के दशकों में उच्च उत्पादक किस्मों, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी नीतियों के चलते धान के उत्पादन और क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। धान की अत्यधिक खेती कई गंभीर चुनौतियों को जन्म दे रही है। सबसे महत्वपूर्ण जल संसाधन की अत्यधिक खपत है। एक हेक्टेयर धान की खेती के लिए लगभग 2,500 से 3,000 घन मीटर पानी की खपत हो जाती है, जो जल संकट के दौर में असहज हो गया है। मृदा की उर्जा का अत्यधिक उपयोग और अधिकांश खेतों में धान की लगातार खेती के कारण मिट्टी की उर्वरता में गिरावट। इसके अलावा, धान के क्षेत्रफल में लगातार वृद्धि के कारण अन्य महत्वपूर्ण फसलों के लिए जगह कम हो रही है, जैसे कि दलहन, तिलहन फसलें और रबी फसलें। यह भारत के आहार संतुलन और आयात निर्भरता को प्रभावित कर रहा है। भारत अब भी दलहन और तिलहन फसलों के आयात पर निर्भर है। जैसे चना, मूंगफली, तिलहन, सरसों आदि।

छत्तीसगढ़ भारत के सबसे बड़े धान उत्पादक राज्यों में से एक है। राज्य में धान की खेती का क्षेत्रफल लगभग 3.8 मिलियन हेक्टेयर है, जो राज्य के कृषि क्षेत्रफल का लगभग 60 प्रतिशत है। वार्षिक उत्पादन लगभग 8.5 मिलियन टन है। छत्तीसगढ़ में धान की खेती का बहुत बड़ा हिस्सा खरीफ में होता है, लेकिन रबी ऋतु में भी धान की खेती का प्रचलन बढ़ रहा है, जो एक चिंता का विषय है।

”धान ही धान” खेती के प्रचलन प्रमुख कारण

1. धान की न्यूनतम समर्थित मूल्यः
धान के लिए सरकार द्वारा निर्धारित MSP अधिक होने के कारण किसान इसे लाभकारी मानते हैं। साथ ही रबी में अन्य फसलों की तुलना में धान की अधिक लाभदायक होती है, खुले बाजार में भी इसका अच्छा दाम मिल जाता है, जिससे किसान इसकी ओर खरीफ और रबी मौसम में झुक रहे हैं।

2. अन्य फसलों की तुलना में निरंतर निगरानी की आवश्यकता नहीं:
धान की खेती में बीमारियों, कीड़ों और जल भराव के लिए अन्य फसलों की तुलना में कम ध्यान देने की आवश्यकता होती पड़ती है, जबकि दलहन या तेली फसलों के लिए निरंतर निगरानी और उपचार की आवश्यकता होती है। इसलिए धान एक कम देखभाल वाली फसल की आवष्यकता होती है,यह भी एक महत्वपुर्ण कारक है जिसके कारण किसान भाई धान को उत्पादन के लिए चुनते है।

3. धान उत्पादन प्रक्रिया का लचीलापनः
धान की खेती में कोई विशिष्ट प्रक्रिया की सख्त आवश्यकता नहीं होती है। इसकी उत्पादन प्रक्रिया काफी उदार हैं सहज है। जैसे उदाहरण के लिए बीज बोने और रोपाई लेही जैसी विधि और विकल्प उपलब्ध हैं। छिटकवा या देशी हल से बुआई, सीड ड्रिल, ड्रम सीडर से बुआई या इसके अलावा विभिन्न रोपाई विधियाँ अपनाई जा सकती हैं। उर्वरकों के उपयोग में भी लचीलापन है, मौसम भी बहुत रीजि़ड नहीं हैं, साथ ही कटाई के लिए भी। इन सभी प्रक्रिया में धान की उपज पर कोई विशेष दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे किसान आसानी से धान की ओर आकर्षित होते हैं।

4. नियमित श्रम की आवश्यकता नहीं:
धान की खेती में श्रम की आवश्यकता कम होती है, खासकर बाढ़ वाले क्षेत्रों में जहाँ धान के लिए बारीक जल नियंत्रण नहीं करना पड़ता। इसके विपरीत, उद्यान, दलहन या तिलहन फसलों में बुआई, निराई, और कटाई के दौरान अधिक श्रम की आवश्यकता होती है।

5. पशुओं और बंदरों से कम नुकसान
धान की खेती में पशुओं और बंदरों द्वारा नुकसान कम होता है, जबकि दलहन या तिलहन फसलों के उत्पादन में बंदर, जानवर से काफी नुकसान होता है। या अन्य शब्दों में धान बाहरी आक्रमण से कम प्रभावित होता है इसलिए धान इन मामलों में एक अधिक सुरक्षित फसल मानी जाती है।

6. अनुकूल मशीनों की उपलब्धता और सरल परिचालन:
ट्रांसप्लांटर, रीपर, कंबाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनें अब छोटे किसानों को भी किराए पर मिल जाती हैं। रख-रखाव आसान और स्पेयर-पार्ट्स सस्ते हैं, जिससे धान की मशीनी खेती “रबी” में भी फैल रही है।

1. छत्तीसगढ़ “धान ही धान” के कारण उभरती चुनौतियाँ:
छत्तीसगढ़ में धान की एकाधिकार वाली खेती ने राज्य की कृषि व्यवस्था को कई गंभीर चुनौतियों के सामने ला खड़ा किया है। “धान का कटोरा” कहलाने वाले इस राज्य में फसल विविधीकरण की कमी से न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि किसानों की आय और स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

2. भूमि विविधता का ह्रासः
ऊँची भूमि को समतल करके धान के खेत बनाए जा रहे हैं, जिससे प्राकृतिक भूमि विविधता (उच्चभूमि, मध्यमभूमि, निम्नभूमि) तेजी से नष्ट हो रही है। भविष्य में सब्जियाँ, फल, दालें और अन्य गैर-धान फसलों के लिए उपयुक्त भूमि की भारी कमी हो जाएगी।

3. जल संकटः
रबी धान की सिंचाई के लिए अत्यधिक जल का उपयोग हो रहा है, जिससे भूजल स्तर कुछ वर्षों में ही तेजी से नीचे चला गया है। महानदी बेसिन के क्षेत्रों में ट्यूबवेलों की संख्या बढ़ने से जल टेबल 5-10 मीटर तक गिर चुकी है, जो भविष्य की खेती के लिए खतरा है।

4. मृदा का असीमित दोहनः
लगातार धान की खेती से मिट्टी में जिंक, आयरन और सल्फर की कमी हो रही है, साथ ही फसल बीमारियाँ (जैसे ब्लास्ट, शीथ ब्लाइट) बढ़ी हैं। इससे उत्पादकता 20-30 प्रतिशत तक घटी है और रासायनिक उर्वरकों का उपयोग बढ़ा है।

5. पराली जलानाः
नवंबर-दिसंबर में धान की पराली जलाने से वायु गुणवत्ता में भारी गिरावट आती है। रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों में AQI 300 से ऊपर पहुँच जाता है, जो स्वास्थ्य जोखिम और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देता है।

6. आहार में पोषण की कमीः
धान-प्रधान भोजन से प्रोटीन, वसा और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो रही है। राज्य में कुपोषण दर से निपटने में और अधिक समय लग सकता है, क्योंकि दलहन-तिलहन जैसी फसलें घरेलू स्तर पर कम हो गई हैं।

7. फसल एवं जैव विविधता में कमीः
कुलथी, तिवड़ा, सरसों, कुसुम, अलसी, अरहर, मूंग-उड़द जैसी देशी फसलें विलुप्त हो रही हैं। इनके बीज संग्रह की कमी से जैव विविधता नष्ट हो रही है और किसानों को उच्च लागत वाले हाइब्रिड बीजों पर निर्भर होना पड़ रहा है। जिससे खाद्य सुरक्षा और बाजार विविधता प्रभावित हो रही है।

8. क्वालिटी राइस की कमीः
अधिक उत्पादन लाभ के कारण लगातार हाइब्रिड, मोटे और उच्च उपज वाली किस्मों पर निर्भरता बढ़ी है जिससे पारंपरिक सुगंधित धान का क्षेत्र घट रहा है और निर्यात योग्य चावल का उत्पादन कम हो रहा है।

“धान ही धान” का प्रतिस्थापन

1. आर्थिक क्षति को कम किया जा सकता है। धान के आर्गेनिक मापदंड के अनुसार पैदावार लेकर निर्यात किया जा सकता है।

2. न्यूनतम समर्थन मूल्य और गुणवत्ता-आधारित उत्पादन, उच्च मूल्य वाली किस्मों पर फोकसः बासमती, सुगंधित या क्वालिटी राइस (जैसे Pusa Basmati 1121) पर अधिक समर्थन मूल्य। इससे कुल रकबा कम होगा, लेकिन निर्यात (जैसे अमेरिका) से आय दोगुनी हो। आर्थिक बोझ कम होगा। साथ ही आर्गेनिक धान प्रमोशन, जैसे जैविक मानकों (NPOP) से अतिरिक्त लाभ।

3. मक्का, मूंग-उड़द में सुधारः फसलों के लिए उपयुक्त तकनीकों का विस्तारः छ.ग. में खरीफ मौसम में धान के रकबे के बाद मक्का और मुंग-उड़द का स्थान आता है। तो इन फसलों के प्रमुख बाधाओं जैसे मक्के की मार्केटिंग और मुंग के लिए ऐसे किस्मों का अनुसंधान व विस्तार किया जाना चाहिए जो एक तुड़ाई वाली हों। मक्के की मार्केटिंग के लिए FPO (Farmer Producer Organizations) और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग। मूंग के लिए एक-तुड़ाई वाली किस्में (Pusa Vishal, SML 668) का विस्तार करें। अरहर में कम-अवधि किस्में UPAAS-1200 (100-110 दिन) या नरेन्द्र अरहर 1 जैसी किस्मों का विस्तार।

4. नान ट्रेडिसनल फसलों को प्रोत्साहनः गन्ना, कपास व गैर अनाज अथवा नान ट्रेडिसनल फसलों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जिनकों विशेष जलवायु की आवश्यकता ना हो। गन्ने की ट्रेंच विधि, बीज उत्पादन (सेटलिंग टेक्नोलॉजी), कपास में ड्रिप सिंचाई। औषधिय गुण वाले फसल अति महत्वपुर्ण हो सकते है। साथ ही जैस गन्ना उत्पादन की उन्नत तकनीक, बीज उत्पादन विधि को किसानों तक पहुचाने से धान ही धान से मोह भंग होगा।

5. छोटे कृषि उपकरण की तकनीक को प्रोत्साहन देने से अधिक इंटर कल्चर आपरेशन चाहने वाले फसलों के उत्पादन को आसान बनायेंगें। जैसे पावर वीडर, मल्टीक्रॉप सीडर, छोटे रोटरी टिलर, चना खुटाई के लिए मशीन।

6. सोयबीन के ब्राड बेड सिस्टम, गन्ने के बीज निर्माण, गन्ने की उन्नत रोपण तकनीक, जैसी तकनीकों का क्षैतिज विस्तार इन फसलों के विस्तार में मदद करेंगी वहीं दूसरी ओर धान के रकबे में कमीं में सहायक होगें।

7. कृषि उपयोग में होने बिजली खपत का आंकलन एवं वितरण का मूल्यांकन किया जा सकता है।

8. धान के अलावा अन्य फसलो के लिए सामूहिक फैसिंग को प्रोत्साहन। साथ ही समय की मांग है कि बंदरों और मवेषियों के प्रबंधन के लिए सशक्त कदम उठाये जानें चाहिऐं।

9. खेतों में धान के बाद दलहन-तिलहन उगाने वाले कृषकों को माडल किसान के रूप मे पहचान एवं उनका उत्साहवर्धन।