योगेंद्र सिंह, सहायक प्राध्यापक (फल विज्ञान) कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र कोरबा
डॉ. देवेंद्र कुमार साहू, अतिथि शिक्षक (सब्जी विज्ञान) कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्रए कोरबा

स्थानीय नाम हिन्दी-बथुआ साग संस्कृत-अगरलोहित,

वानस्पतिक विवरण
बथुआ चिनोपोडिएसी कुल का पौधा है। इस कुल में मुख्यरूप से शाकीय, झाड़ीदार और बहुत कम वृक्ष वाले पौधे पाये जाते हैं। बथुआ वानस्पतिक नाम चिनोपोडियम एलबम (chenopodium album L.) है। इसके पौधे विश्वभर में पाये जाते हैं। जिसमें 8 प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं।

बथुआ एक शाकीय पौधा है। तने का रंग हरा या बैगनी होता है। पत्तियाँ डंठलयुक्त, संपूर्ण तथा एकान्तर क्रम में लगी होती है। पत्तियों के नीचे की सतह दानेदार होती है। पुष्प छोटे, हरे रंग के एवं गुच्छे में एवं सामान्यतः पौधे के शीर्ष से निकलते हैं। बीज 1.5 मिमी. व्यास के डिस्क आकार के काले रंग के एवं चमकदार होते हैं।

जाड़े की पत्ती वाली सब्जियों में बथुआ का प्रमुख स्थान है। प्रारम्भिक अवस्था में इसके संपूर्ण पौधे एवं बाद में पत्तियों एवं मुलायम टहनियों को साग के रूप में प्रयोग किया जाता है। इससे विविध प्रकार के व्यंजन जैसे-बथुआ रोटी, बथुआ पराठा, बथुआ साग, बथुआ भुजिया, रायता एवं पकोड़ा आदि तैयार किया जाता है। इसमें प्रोटीन और खनिज तत्व पालक एवं पत्ता गोभी से भी अधिक पाया जाता है । बथुआ की पत्ती का पोषक मूल्य सारिणी (7.1) में दिया गया है ।

सारिणी (7.1) बथुआ का पोषक मूल्य (प्रति 100 ग्राम खाने योग्य भाग में)

पोषक तत्व

मत्रा

नमी (ग्राम)

89.6

प्रोटीन (ग्राम)

3.7

वसा (ग्राम)

0.4

खनीज (ग्राम)

2.6

कार्बोहाइड्रेट्स (ग्राम)

2.9

ऊर्जा (कि. कैलोरी)

30

आयरण (मिग्रा.)

4.2

कैरोटीन (माइक्रोग्रा.)

3660

थाइमिन (मिग्रा.)

0.03

राइबोफ्लेविन (मिग्रा.)

0.06

नियासिन (मिग्रा.)

0.02

विटामिन सी (मिग्रा.)

12

स्रोतः गोपालन एवं सहयोगी 1999

बथुआ की पत्तियों का औषधी महत्व भी है। यह रेचक, कृमि नाशी एवं हृदयवर्धक होता है। इसके सेवन से पेट के गोल एवं हुक वर्म कृमि नष्ट हो जाते हैं। इसकी पत्तियों का जूस जलने से उत्पन्न घाव को ठीक करता है। इसकी पत्तियों का काढ़ा एल्कोहल के साथ शरीर पर मालिश करने से हड्डी के जोड़ों एवं इससे सम्बन्धी रोगों में लाभप्रद होता है।

जलवायु एवं भूमि
बथुआ के पौधे क्षारीय भूमि में ही उगते हैं जबकि अधिक अम्लीय भूमि में अंकुरण नहीं होता है। बथुआ ठंडे मौसभ की फसल है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में यह जाड़े के प्रमुख खरपतवार के रूप में उगता है। बुआई के लिए अक्टूबर का महीना उपयुक्त होता हैं। खेती के लिए इसे सभी प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है, लेकिन बलुई दोमट तथा दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है। चिकनी मिट्टी में भी इसे उगाया जा सकता है।

बुआई एवं सस्य क्रियायें
इसकी खेती के लिए बुआई से पूर्व 2-3 जुताई करके खेत की मिट्टी को अच्छी प्रकार तैयार कर लिया जाता है। एक हेक्टेयर बुआई के लिए 1.5-2 किग्रा. बीज की आवश्यकत होती है। बथुआ के बीज छोटे आकार के होते हैं अतः इसको पर्याप्त नमी में 0.5-1.0 सेमी. गहरी बुआई करते हैं। बीज को बालू या रेत मिलाकर कुड़ों में बुआई की जा सकती है। पंक्तियों में बुआई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-40 सेमी. रखी जाती है।

बथुआ की फसल को पौध तैयार करके रोपण द्वारा भी सफलता पूर्वक लिया जा सकता है। नर्सरी में बीज बुआई के एक महीने बाद जब पौधा 7-8 सेमी. लम्बा हो जाय तब पूर्ण रूप से तैयार क्यारियों में इसे 30-40 सेमी. के अन्तराल पर रोपण कर दिया जाता है। पौधे से पौधे की दूरी 8-10 सेमी. रखते हैं। रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करने से पौधे अच्छी तरह से स्थापित हो जाते हैं। इसकी अच्छी उपज के लिए 50-60 किग्रा. यूरिया की प्रति हेक्टेयर की दर से 2-3 बार में टापड्रेसिंग करनी चाहिए। टापड्रेसिंग का कार्य पौधों की कटाई के बाद किया जाय।

किस्में
बथुआ की कोई विकसित किस्म नहीं है। अभी कुछ वर्ष पूर्व भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली से इसके जंगली पौधों के जनन द्रव्यों से एकत्र करके उनमें स्वयं सेचन तथा एक पौधा चयन विधि से शुद्ध चयन करके ‘पूसा बथुआ नं.1‘ किस्म विकसित की गयी है

पूसा बथुआ नं. 1 (Pusa Bathua No- 1)
इसके पौधों की ऊंचाई 2.25 मीटर तक जाती है। पत्तियों की लम्बाई 10.5 सेमी. एवं चैड़ाई 3.0 सेमी. होती है तथा उनका रंग बैंगनी हरा होता है। मुलायम तने की मोटाई 0.45 सेमी, तथा दो गाँठों के बीच का अन्तर 2.5 सेमी, और तने का रंग बैगनी हरा होता है। यह किस्म बुआई के लगभग 40-45 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह लगभग 150 दिन तक वानस्पतिक अवस्था में बनी रहती है और बुआई के 175-180 दिन बाद इसमें फूल आता है ।

कटाई एवं उपज
बथुआ में पहली कटाई बीज बुआई के लगभग 40-45 दिन बाद मिल जाती है तथा बाद में 12-15 दिन के अन्तराल पर इसकी कटाई की जा सकती है। जब फसल में फूल आना प्रारम्भ होता है तब कटाई रोक दी जाती है। इसकी अच्छी खेती से 300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर हरी पत्तियों की उपज प्राप्त होती है।