डॉ. पी. मुवेंथन (वरिष्ठ वैज्ञानिक), डॉ. गुंजन झा (वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, राजनांदगांव),
सुमन सिंह (वरिष्ठ अनुसंधान सहायक, एनएएसएफ परियोजना),
डॉ. हेम प्रकाश वर्मा (यंग प्रोफेशनल, एफएफपी परियोजना)
भाकृअनुप. - राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, बारोंडा, रायपुर (छत्तीसगढ़)
परिचय
जलवायु स्मार्ट कृषि ऐसी कृषि पद्धति है जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादन को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाना, उत्पादकता को बढ़ाना और पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करना है। यह एकीकृत दृष्टिकोण है जिसमें संसाधनों का कुशल उपयोग, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और तकनीकी नवाचारों को शामिल किया जाता है।जलवायु स्मार्ट कृषि तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है। पहला सिद्धांत है उत्पादकता बढ़ाना, जिसके अंतर्गत जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बावजूद फसल उत्पादन और किसानों की आय को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। दूसरा सिद्धांत है लचीलापन एवं अनुकूलन क्षमता विकसित करना, जिसके तहत फसलों, किसानों और कृषि प्रणालियों को सूखा, बाढ़, लवणीयता और तापमान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों से सुरक्षित बनाने के उपाय अपनाए जाते हैं। तीसरा सिद्धांत है ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, जिसमें ऐसी तकनीक और प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता है जो पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव को घटाएं, जैसे – जल बचाने वाली विधियाँ, फसल अवशेष प्रबंधन तथा जलवायु अनुकूल किस्मों का प्रयोग। इन सिद्धांतों के माध्यम से जलवायु स्मार्ट कृषि न केवल किसानों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में सक्षम बनाता है बल्कि सतत कृषि विकास का भी मार्ग प्रशस्त करता है।
जलवायु स्मार्ट धान किस्मों की आवश्यकता
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के कारण धान उत्पादन कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है। सूखा, बाढ़, लवणता और बढ़ते तापमान जैसी समस्याएँ धान की उपज और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर रही हैं। अनियमित वर्षा और लंबे सूखे की अवधि से बुवाई प्रभावित होती है, वहीं अचानक आई बाढ़ और जलभराव से पौधों की वृद्धि रुक जाती है। तटीय क्षेत्रों में मिट्टी की लवणता और क्षारीयता धान उत्पादन को गंभीर रूप से कम करती है, जबकि उच्च तापमान परागण और दाने भरने की प्रक्रिया को बाधित कर उपज घटा देता है। इन परिस्थितियों में किसान सबसे अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि उनकी आय और आजीविका धान उत्पादन पर ही निर्भर करती है। अतः किसानों को ऐसी किस्मों की आवश्यकता है जो बदलते जलवायु परिदृश्य के अनुरूप ढल सकें और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्थिर एवं संतोषजनक उत्पादन दे सकें। यही कारण है कि जलवायु स्मार्ट धान किस्मों का विकास और प्रसार आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
जलवायु स्मार्ट धान किस्मों के लक्षण
जलवायु स्मार्ट धान किस्मों में विशेष गुण होते हैं जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्थिर उत्पादन सुनिश्चित करते हैं।
- सूखा सहनशीलता – गहरी जड़ प्रणाली के कारण कम वर्षा में भी अच्छी पैदावार (जैसे सहभगी धान, सी.आर. धान 801)
- बाढ़ सहनशीलता – पानी में डूबे रहने पर भी जीवित (जैसे स्वर्णा- सब-1, आई.आर. 64-सब-1)
- लवणता सहनशीलता – खारे/क्षारीय मिट्टी में भी उपज (जैसे सी.एस.आर. 30, सी.एस.आर. 36 और सी.एस.आर. 43)
- उच्च तापमान सहनशीलता – गर्मी में परागण व दाना भराव सामान्य (जैसे एन 22 और डी.आर.आर. धान 42)
- कम अवधि व जल दक्षता – जल्दी पकने वाली किस्में, कम पानी में उत्पादन और संसाधन संरक्षण।
भारत में प्रमुख जलवायु स्मार्ट धान किस्में
भारत में बदलते जलवायु परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए अनेक जलवायु स्मार्ट धान किस्में विकसित की गई हैं। सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सहभगी धन और सी.आर. धान 801, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्वर्णा-सब1 और IR64-सब1, तटीय व लवणीय भूमि में.एस.आर. 30, सी.एस.आर. 36 और सी.एस.आर. 43तथा उच्च तापमान व शीघ्र परिपक्वता की आवश्यकता वाले क्षेत्रों में एन 22 और डी.आर.आर. धान 42किसानों के लिए उपयोगी हैं। ये किस्में प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्थिर उत्पादन देती हैं, पानी व संसाधनों की बचत करती हैं और खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सतत कृषि को बढ़ावा देती हैं।
जलवायु परिवर्तन के लिए सहनशील धान की किस्में
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क्रमांक |
धान की किस्म |
सहनशीलता/विशेषता |
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1. |
स्वर्णा सब-1 |
बाढ़ की सहनशील किस्म |
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2. |
डीआरआर धान 44 |
सूखा सहनशील |
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3. |
डीआरआर धान 45 |
सूखा सहनशील |
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4. |
सहभागी धान |
सूखा सहनशील |
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5. |
सीआर धान 801 (मौदामनी) |
सूखा एवं ताप सहनशील |
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6. |
सीआर धान 802 |
लवणता सहनशील |
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7. |
सीआर धान 803 |
लवणता सहनशील |
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8. |
सीआर धान 304 |
सूखा सहनशील |
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9. |
सीआर धान 305 |
बाढ़ की सहनशील किस्म |
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10. |
आईआर-64 सब-1 |
बाढ़ की सहनशील किस्म |
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11. |
बीआईएनए धान 11 |
सूखा सहनशील |
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12. |
बीआईएनए धान 12 |
लवणता सहनशील |
सतत खेती में जलवायु स्मार्ट धान किस्मों की भूमिका
जलवायु स्मार्ट धान किस्में सतत खेती में अहम योगदान देती हैं। ये कम पानी में उगकर सिंचाई लागत घटाती और जल संसाधन बचाती हैं। इनसे मीथेन उत्सर्जन कम होता है, खासकर कम अवधि वाली किस्मों और वैकल्पिक गीली-सूखी विधि तकनीक के साथ। सबसे बड़ी विशेषता है कि ये सूखा, बाढ़, लवणीयता और उच्च तापमान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्थिर उपज देती हैं, जिससे किसानों की आय और आजीविका सुरक्षित रहती है। साथ ही, ये किस्में सतत विकास लक्ष्य जैसे खाद्य सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई और पारिस्थितिकी संरक्षण में योगदान देकर टिकाऊ व पर्यावरण-अनुकूल कृषि की दिशा में मार्ग प्रशस्त करती हैं।
चुनौतियाँ एवं अवसर
जलवायु स्मार्ट धान किस्मों के प्रसार में मुख्य चुनौतियाँ गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता और किसानों में जागरूकता की कमी हैं। समय पर प्रमाणित बीज न मिलने और जानकारी के अभाव में किसान परंपरागत किस्मों पर निर्भर रहते हैं। दूसरी ओर, अनुसंधान और जैव प्रौद्योगिकी से बड़े अवसर उपलब्ध हैं। बायोटेक्नोलॉजी और जीन संपादन की मदद से अधिक सहनशील, उच्च उपज देने वाली तथा पोषणयुक्त किस्में विकसित की जा सकती हैं। यदि बीज उत्पादन और वितरण प्रणाली सुदृढ़ की जाए तथा किसानों को प्रशिक्षण और जागरूकता प्रदान की जाए, तो ये चुनौतियाँ अवसरों में बदलकर धान उत्पादन को जलवायु अनुकूल और टिकाऊ बना सकती हैं।
निष्कर्ष
वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के बीच जलवायु स्मार्ट धान किस्में किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प हैं। ये किस्में सूखा, बाढ़, लवणता और तापमान जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में स्थिर उपज देती हैं तथा कम अवधि और जल उपयोग दक्षता से संसाधन बचाती हैं। इससे किसानों को जोखिम कम करने, उत्पादन स्थिर रखने और पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलती है। गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी और जागरूकता का अभाव चुनौतियाँ हैं, पर अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी और सहयोग से इन्हें अवसरों में बदला जा सकता है। ये किस्में सतत कृषि, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।


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