निलेश कुमार साहू, सब्जी विज्ञान विभाग, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, बालाघाट (म.प्र.)
श्रीकांत साहू, पीएचडी रिसर्च स्कॉलर, सब्जी विज्ञान विभाग, महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, पाटन, दुर्ग (छ.ग.)

कवर्धा में अरबी की खेती वरदान
  • छत्तीसगढ़ के कवर्धा में, विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में, कोलोकेसिया की खेती एक प्रमुख कंद फसल के रूप में की जाती है। यह एक बारहमासी पौधा है जो अपने खाद्य कंद (जडं) और पतियों के लिए उगाया जाता है। छत्तीसगढ़ में इसकी खेती कुल 7,815 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है, जिससे 110,260 मीट्रिक टन उत्पादन होता है। विशेष रूप से, कबीरधाम जिला छत्तीसगढ़ में अरबी का सबसे बड़ा क्षेत्रफल (819 हेक्टेयर) और सबसे अधिक उत्पादन (12,700 मीट्रिक टन) वाला जिला है। कोंडागांव जिले में अरबी का भी महत्वपूर्ण क्षेत्रफल (819 हेक्टेयर) और उत्पादन (11,541 मीट्रिक टन) है। अन्य जिले कांकेर, बस्तर, दंतेवाड़ा, सरगुजा और रायगढ़ जहां अरबी उगाई जाती है।
  • अरबी की वैज्ञानिक नाम कोलोकेसिया इसकुलेन्टा तथा यह एरेसी कुल में आता है। इस फसल की खेती मुख्यतः सब्जी के रूप में किया जाता है। अरबी के मूल कन्द, मूल कन्द के बगल से निकले कन्दों, तना और पतियों का उपयोग विभिन्न प्रकार के सब्जियों बनाने में किया जाता है।
  • अरबी के कंद में प्रमुख रूप से स्टार्च होता है। अरबी की पतियों में विटामिन 'ए' तथा कैल्शियम, फॉस्फोरस और आयरन भी पाया जाता है। अरबी में खाद्य मूल्य प्रति 100 ग्राम में नमी 37.10 ग्राम, वसा 0.10 ग्राम, रेशा 1.00 ग्राम, खनिज पदार्थ-1.70 ग्राम, प्रोटीन-3.00 ग्राम, लोहा-1.70 मि. ग्रा. पोटेशियम 555.0 मि.ग्रा., थियामिन-0.9 मि.ग्रा. कार्बोहाइड्रेट विटामिन ए 400.0 आई. यू. कैल्शियम 40.00 मि.ग्रा. तथा सोडियम-9.00 मि.ग्रा. पोषक तत्व की मात्रा पाई जाती है। इसके साथ ही बहुत से सूक्ष्म तत्व भी पाये जाते है जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होते है।

जलवायुः-
रबी की फसल को गर्म तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसलिए इसे ग्रीष्म एवं वर्षा दोनो ही मौसम में सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है कबीरधाम जिला में अरबी की खेती मुख्यतः ग्रीष्म मौसम में की जाती है।

मिट्टीः-
अरबी की खेती के लिए उपजाऊ बलुई दोमट, ऊँची तथा अच्छी जल निकास वाली भूमि उपयुक्त होता है। चिकनी मिट्टी को छोड़कर इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है जिसकी पी. एच मान 5.5 से 7.0 होना चाहिए।

शस्य कियाएः-

अरबी बोने का समय व बोने की विधिः-
खरीफ में जून से 15 जुलाई और जायद में फरवरी मार्च तक बुवाई की जाती है। अरबी फसल की बुआई दो प्रकार से की जाती है। समतल क्यारियों में बुआई कतारों की आपसी दूरी 45 से.मी. तथा पौधो की दूरी 30 सें.मी. और कंदो की 0-5 सें.मी. की गहराई पर बुवाई करनी चाहिए। मेड बनाकर बुआई 45 सें.मी. की दूरी पर मेंड बनाकर दोनों किनारो पर 30 सें.मी. की दूरी पर कंदो की बुवाई करें। बुवाई के बाद कंद को मिट्टी से अच्छी तरह ढंक देना चाहिए। जहा पानी उचित मात्रा में उपलब्ध हो वहा पंक्ति व पौधो की दुरी कम की जा सकती है। जिससे प्रति हेक्टेयर अधिक कंद उत्पादन होगा।

अरबी के लिए भूमि की तैयारी
अरबी के लिए पर्याप्त जीवांश एवं उचित जल निकास युक्त रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। खेत की तैयारी के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से और 3-4 बार देशी हल से जुताई करनी चाहिए। खेत की तैयारी के समय 250 किवंटल गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर के हिसाब से बुवाई के 15-20 दिन पहले खेत में मिला देनी चाहिए। अरबी फसल की रोपाई के लिए मेड और नालिया बनाकर समतल भूमि तैयार किया जाता है।

अरबी की उन्नत किस्में:-
अरबी की किस्मों में पंचमुखी, सफेद गौरिया, सहस्त्रमुखी, सी 9, सलेक्शन प्रमुख है इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा विकसित इंदिरा अरबी 1 किस्म छत्तीसगढ़ के लिए अनुमोदित है। इसके अतिरिक्त नरेंद्र अरबी 1 अच्छे उत्पादन वाली किस्में है।

अरबी रोपाई का समय, दूरी एवं बीज दरः-
अरबी रोपाई मुख्यतः कबीरधाम जिले में फरवरी मार्च में की जाती है। एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए वाह्य कन्द की 20-25 ग्राम के औसत वजन वाली 10-12 क्विंटल कन्द की आवश्यकता पडती है। अरबी के कंदो को 30-50 सें.मी. की दूरी पर तथा समतल नालियों में 5-6 सें.मी. की गहराई पर रोपाई करें। रोपाई करने के बाद नाली पर मिट्टी चढ़ाकर मेड़ बना देना चाहिए जिससे सिंचाई करने में आसानी होती है। रोपाई के तुरन्त बाद हल्का सिंचाई करना चाहिए जिससे पौधे समय पर उग आते है।

उर्वरक की मात्राः-
नत्रजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश 80:60:80 कि.ग्रा./हे. की दर से रासायनिक उर्वकों का प्रयोग तीन भागों में बाँट कर करें। रोपाई से पूर्व फॉस्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा नत्रजन एवं पोटाश की एक तिहाई मात्रा का प्रयोग करें। नत्रजन एव पोटाश की एक तिहाई मात्रा अंकुरण होने के 7-8 दिनों बाद तथा शेष बची मात्रा एक माह बाद मिट्टी चढाते समय देना चाहिए।

अरबी में सिंचाई:-
फरवरी माह में रोपाई की गई फसल मे 5-6 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। खेतो में नमी बनाये रखने के लिए 12-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करने पर अच्छी उपज होती है।

निराई-गुडाई:-
प्रथम निराई 45-50 दिनों बाद करें इसके पश्चात मेंड़ पर मिट्टी चढ़ाना चाहिए जिससे पौधो की अच्छी बढ़वार के साथ-साथ उपज मे भी वृध्दि होती है। खरपतवार के नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी का प्रयोग करे जैसे एल्ट्रजीन या सीमेजिन का एक किलोग्राम कियाशील तत्व/हे. की दर से प्रयोग करें।

प्रमुख रोग एवं कीटः-
  • लीफ ब्लाइट फफूँद फाइटोफथोरा पतो के किनारो पर बैगनी खाकी रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं। फफूंद नाशक जैसे- डाइथेन एम 45 का 0.2 प्रतिशत या ब्लाइटाक्रा-50 का 0.3 प्रतिशत छिडकाव से रोकथाम की जा सकती है।
  • झुलसा रोग झुलसा रोग से पतियों में काले काले धब्बे हो जाते हैं। बाद में पतियां गलकर गिरने लगती है। इसका उपज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए 15-20 दिन के अंतर से डाईथेन-45 का 2.5 ग्राम प्रति लिटर या कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत मेन्कोजेब 63 प्रतिशत डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल का छिडकाव करते रहें। साथ ही फसल चक अपनाएं।

कीट:-
  • मुख्यतः कद्दू के लाल भृंग अरबी लीफ हॉपर, शकरकंद हॉक मोथ व एफिड्स अरबी के मुख्य कीट है। रस चूसने वाले किट जैसे- माहों सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टोक्स दवा को 1 एम.एल. प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें।
  • सुंडी व मक्खी कीट अरबी पतियों को खा कर हानि पहुंचाती है क्योकि यह कीटे नई पतियों को खा जाते है। इसकी रोकथाम के लिए प्रोफेनोफास 50 ई.सी. साइपरमेथ्रिन 3 प्रतिशत ई.सी. 01. मि.लि. प्रति लिटर पानी का 500 लि. प्रति हे. घोल बनाकर छिडकाव करे।
  • स्केल कीट रस चूसकर नुकसान पहुँचाते हैं जिसके फलस्वरूप उत्पादन में गिरावट आ जाती है। बुवाई के लिये रोग रहित प्रमाणित स्वस्थ कंद ही उपयोग करना चाहिये। सिकुड़े हुए या सूखे कन्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये।
  • मिलीबग एवं स्केल कीट के नियत्रण हेतु बुवाई से पूर्व कंदो को डाईमिथोयेट 30 ई.सी. का 0.5 प्रतिशत के घोल रो उपचारित करना चाहिये। इसके बाद कंदो को छाया में सुखाकर बुवाई के काम में लेना चाहिये।

अरबी की खुदाई एवं उपजः-
अरबी की खुदाई कंदो के आकार, प्रजाति, जलवायु और भूमि की उर्वराशक्ति पर निर्भर करती है। साधारणतः बुवाई के 130-140 दिन बाद जब पतियां सूख जाती है तब खुदाई करनी चाहिए। उपज उन्नत तकनीक का खेती में समावेश करने पर 300-400 क्विंटल प्रति है, तक उपज प्राप्त कर सकते है।

भण्डारणः-
अरबी के कंदो को हवादार कमरे में फैलाकर रखें। जहां गर्मी न हो। इसे कुछ दिनों के अंतराल में पलटते रहना चाहिए। सड़े हुए कंदो को निकालते रहें और बाजार मूल्य अच्छा मिलने पर शीघ बिकी कर दें।