शिवानी क्षीरसागर, ( पी.एच.डी. स्कॉलर पुष्प विज्ञान विभाग ) ,
डॉ. सुबुही निशाद, NSS प्रोग्राम ऑफिसर (गर्ल्स यूनिट) और स्पोर्ट्स ऑफिसर
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़
भूमिका
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में बागवानी का विशेष स्थान है। फलों, सब्जियों, मसालों, फूलों एवं औषधीय पौधों के क्षेत्र में भारत का विश्व में अग्रणी स्थान है। बागवानी उत्पाद न केवल पोषण प्रदान करते हैं, बल्कि इनकी विविधता एवं प्रसंस्करण क्षमता के कारण ग्रामीण आजीविका में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिर भी, भारत में बागवानी उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा कटाई के बाद उचित भंडारण, प्रसंस्करण एवं विपणन के अभाव में नष्ट हो जाता है।
भारत में बागवानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो कम भूमि क्षेत्र से अधिक उत्पादन, पोषण, एवं रोजगार सृजन की अपार संभावनाएं प्रदान करता है। किंतु बागवानी उत्पादों की बड़ी मात्रा हर वर्ष कटाई के बाद नष्ट हो जाती है, जिसका प्रमुख कारण उपयुक्त भंडारण, प्रसंस्करण एवं विपणन की सुविधाओं की कमी है। इस चुनौती का समाधान स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्धन द्वारा किया जा सकता है, जैसे—फलों एवं सब्जियों का अचार, जैम, जूस, सुखाकर पाउडर बनाना, फूलों से इत्र, सूखे गुलदस्ते इत्यादि। इन उपायों से न केवल उत्पाद का उपयोग बढ़ता है, बल्कि इसकी आर्थिक कीमत भी कई गुना बढ़ जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश किसान, महिलाएं एवं युवा इस प्रकार के प्रसंस्करण एवं बाजार अवसरों से अनभिज्ञ रहते हैं। ऐसे में प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रदर्शनी, समूह आधारित जागरूकता, और डिजिटल माध्यमों द्वारा उन्हें तकनीकी जानकारी, पैकेजिंग, गुणवत्ता मानक, एवं विपणन रणनीतियों से अवगत कराया जाना आवश्यक है। सरकार की योजनाएं जैसे प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PM-FME), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM), एवं कृषि अवसंरचना कोष (AIF) ग्रामीण उद्यमों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण, एवं विपणन में सहयोग प्रदान करती हैं।
यदि स्थानीय स्तर पर बागवानी उत्पादों के प्रसंस्करण एवं विपणन की समुचित जानकारी और समर्थन ग्रामीण जनता को उपलब्ध कराया जाए, तो इससे आय में उल्लेखनीय वृद्धि, महिला सशक्तिकरण, और स्थानीय रोजगार सृजन संभव है। इस प्रकार, यह रणनीति न केवल कृषि विकास को बढ़ावा देती है, बल्कि आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की दिशा में भी एक ठोस कदम है।
बागवानी उत्पादों में मूल्यवर्धन का अर्थ एवं आवश्यकता
मूल्यवर्धन का अर्थ
मूल्यवर्धन का तात्पर्य है – कच्चे बागवानी उत्पादों को ऐसे रूप में परिवर्तित करना जिससे उनका आर्थिक मूल्य बढ़ जाए, उपयोगिता में वृद्धि हो, और वे अधिक समय तक संरक्षित रह सकें। यह प्रक्रिया उत्पादन के उपरांत शुरू होती है जैसे – धोना, काटना, सुखाना, अचार बनाना, पैकिंग, इत्र बनाना, आदि।
मूल्यवर्धन की आवश्यकता
- फसल के अपव्यय को कम करने हेतु
- उत्पाद के मूल्य को बढ़ाने हेतु
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन हेतु
- महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार प्रदान करने हेतु
- बाजार मांग के अनुसार उत्पादों को उपलब्ध कराने हेतु
बागवानी उत्पादों के प्रमुख मूल्वर्धित रूप
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उत्पाद
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मूल्यवर्धित उत्पाद
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आम
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पल्प, स्क्वैश, जैम, अमचूर
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टमाटर
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केचअप, सॉस, प्यूरी
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आँवला
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कैंडी, चूर्ण, मुरब्बा
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फूल
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गुलकंद, इत्र, सूखे
गुलदस्ते
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मिर्च
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अचार, पाउडर
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धनिया, पुदीना
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सूखे
पत्ते, हर्बल
टी
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केले
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चिप्स, केले का आटा
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ग्रामीणों की रुचि
ग्रामीण क्षेत्रों में बागवानी उत्पादों के स्थानीय प्रसंस्करण और विपणन की दिशा में रुचि धीरे-धीरे बढ़ रही है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ कृषकों को प्रशिक्षण, समर्थन एवं बाज़ार से जुड़ने के अवसर मिले हैं। अब किसान केवल उपज बेचकर सीमित लाभ लेने के बजाय उसे मूल्यवर्धित करके अधिक लाभ अर्जित करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
ग्रामीण स्तर पर स्थानीय प्रसंस्करण के लाभ
1.आर्थिक लाभ
- फसल को बाजार में बेचने के बजाय प्रसंस्करण करके कई गुना अधिक लाभ
- विपणन योग्य उत्पादों की विविधता में वृद्धि
- स्वयं सहायता समूहों द्वारा उत्पाद की बिक्री से समूह आय में वृद्धि
- अतिरिक्त रोजगार के अवसरों की उपलब्धता
2.सामाजिक लाभ
- महिलाओं को घर से ही स्वरोजगार का अवसर
- युवाओं के लिए स्टार्टअप एवं नवाचार की संभावना
- गांव में ही कार्य के अवसर, जिससे पलायन में कमी
- ग्रामीण समाज में आत्मनिर्भरता की भावना का विकास
3.पोषण एवं सुरक्षा
- प्रसंस्करण से पोषण तत्त्वों की सुरक्षा होती है
- उपयोगकर्ता को गुणवत्तापूर्ण एवं स्वच्छ उत्पाद मिलते हैं
- स्थानीय रूप से पौष्टिक उत्पाद उपलब्ध रहते हैं
ग्रामीण समुदायों में जागरूकता की आवश्यकता : ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक किसान व महिलाएँ यह नहीं जानते कि बागवानी उत्पादों का स्थानीय स्तर पर कैसे उपयोग करके आय में वृद्धि की जा सकती है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:
- पैकेजिंग व ब्रांडिंग की जानकारी की कमी
- विपणन के आधुनिक साधनों से अपरिचय
- सरकारी योजनाओं की जानकारी न होना
इसलिए, जागरूकता निर्माण अत्यंत आवश्यक है, ताकि ग्रामीण उत्पादकों को प्रशिक्षण, तकनीकी ज्ञान, और बाज़ार से जुड़ने की जानकारी मिल सके।
जागरूकता निर्माण के माध्यम
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माध्यम
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विवरण
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प्रशिक्षण
कार्यशालाएँ
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कृषि
विज्ञान केंद्रों (KVK), NGOs द्वारा
ग्रामीण क्षेत्र में
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रेडियो/टीवी कार्यक्रम
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ग्रामीण
भाषा में कृषि
जागरूकता अभियान
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मोबाइल
ऐप्स
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कृषि
तकनीक, मूल्यवर्धन
व विपणन पर
आधारित
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ग्रामीण
मेला
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SHG उत्पादों की
प्रदर्शनी व बिक्री
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डिजिटल
मंच
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WhatsApp, Facebook से ग्रामीण उत्पादकों
को जोड़ना
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विपणन के तरीके
पारंपरिक विपणन
- गांव के साप्ताहिक हाट-बाजार
- स्थानीय दुकानदारों के माध्यम से
- पंचायत भवन, मंदिरों व स्कूलों में बिक्री
आधुनिक विपणन
- ई-कॉमर्स पोर्टल (Amazon, Flipkart, ONDC)
- सोशल मीडिया (WhatsApp, Facebook, Instagram)
- किसान उत्पादक संगठन (FPO) द्वारा ब्रांडेड बिक्री
- QR कोड आधारित ट्रेसबिलिटी व डिजिटल लेबलिंग
सफलता की कहानियाँ (Case Studies)
(i) बस्तर (छत्तीसगढ़): इमली प्रसंस्करण महिला SHG ने जंगल से एकत्र की गई इमली से कैंडी, पेस्ट व चटनी तैयार की और आंगनवाड़ी व स्कूलों में आपूर्ति शुरू की। प्रति महिला ₹1.5 लाख वार्षिक आय।
(ii) सोलापुर (महाराष्ट्र): टमाटर सॉस यूनिट एक किसान समूह ने टमाटर को सीधे बेचने के बजाय सॉस व प्यूरी बनाना शुरू किया। उत्पादों को होटल, स्कूल व ऑनलाइन बेचा जा रहा है।
(iii) तमिलनाडु: केले से चिप्स निर्माण ग्रामीण युवाओं ने केले से चिप्स बनाकर लोकल दुकानों व होटल इंडस्ट्री में आपूर्ति शुरू की। पूरे समूह की सालाना आय ₹12 लाख से अधिक हो गई।
सरकारी योजनाएं एवं सहयोग
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योजना
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सहयोग
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PM-FME योजना
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ODOP आधारित प्रशिक्षण,
35% सब्सिडी, मार्केटिंग
सहायता
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राष्ट्रीय
ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM)
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SHG आधारित उद्यमिता
का सशक्तिकरण
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कृषि
अवसंरचना कोष
(AIF)
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प्रोसेसिंग
यूनिट हेतु कम
ब्याज पर ऋण
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SFAC एवं
NABARD
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FPO गठन,
विपणन व मूल्य
संवर्धन में सहयोग
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MIDH (बागवानी मिशन)
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कोल्ड
स्टोरेज, प्रोसेसिंग
हब, नर्सरी
सहयोग
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चुनौतियाँ
- तकनीकी प्रशिक्षण व उपकरणों की अनुपलब्धता
- खाद्य सुरक्षा व FSSAI लाइसेंस की जटिलता
- ई-विपणन में डिजिटल साक्षरता की कमी
- बाजार प्रतिस्पर्धा में ब्रांड की कमजोरी
समाधान एवं सुझाव
- SHG व FPO को प्रशिक्षण व मार्केटिंग में प्राथमिकता
- सरल पैकेजिंग व लेबलिंग तकनीक का प्रसार
- मोबाइल फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना
- ब्लॉक स्तर पर ग्रामीण उद्यमिता प्रशिक्षण केंद्र
- डिजिटल साक्षरता अभियान व ऑनलाइन विपणन की सुविधा
निष्कर्ष: बागवानी आधारित उत्पादों के स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन के माध्यम से न केवल किसानों की आय में वृद्धि की जा सकती है, बल्कि महिलाओं, युवाओं और स्वयं सहायता समूहों को भी सशक्त किया जा सकता है। ग्रामीण समुदायों को यदि सही जानकारी, तकनीक, प्रशिक्षण और विपणन सहायता प्रदान की जाए, तो यह पहल "ग्राम स्वावलंबन" और "आत्मनिर्भर भारत" की दिशा में एक सशक्त कदम साबित होगी।
संदर्भ
1. खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय, भारत सरकार (2023), PM-FME Guidelines
2.राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड रिपोर्ट (2022)
3. NABARD ग्रामीण मूल्यवर्धन रिपोर्ट (2021)
4. कृषि विज्ञान केंद्र, रायपुर – प्रशिक्षण मॉड्यूल
5. Singh & Meena (2022). Indian Journal of Agricultural Marketing
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