डॉ. विवेक कुमार सिंघल, डॉ. साक्षी बजाज, डॉ. आदित्य सिरमौर,
कोमल चावला और डॉ. अनुराग
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)

परिचय-
पारंपरिक खेती की पद्धति मृदा से, जड़ो के माध्यम से आवश्यक पोषक तत्व ग्रहण करते है। मृदारहित खेती में मृदा के उपयोग किये बिना, जड़ो को विकसित किया जाता हैं तथा पौधे उगाये जाते है। इस विधी में पौधो में आवश्यक पोषक तत्वो की आपूर्ति जल के माध्यम से किया जाता है। पौधो को नियंत्रित वातावरण में जैसे ही आक्सीजन उच्च स्तर, उपयुक्त तापमान तथा पीएच आदि के साथ-साथ पोषक तत्वो को भी प्रभावी रुप से जड़ो तक पहुंचाया जाता है।

मृदा रहित खेती के प्रकार-

हाइड्रोपोनिक्स
यह जल आधारित मृदा रहित खेती की विधी है जिसमें पोषक तत्वो के घोल में पौधो को उगाया जाता है। इस विधि में पौधो को अक्रिय माध्यम जैसे-पैलाइट, पीट, काईया वर्मी क्यूलाइट में उगाया जाता है।

सर्वश्रेष्ठ हाइड्रोपोनिक पौधे
हाइड्रोपोनिक प्रणालियाँ विभिन्न प्रकार के पौधों की खेती करने का उत्कृष्ट अवसर प्रदान करती हैं। सब्जियों, जड़ी-बूटियों और फलों सहित सर्वश्रेष्ठ हाइड्रोपोनिक पौधे की सूची निम्न है, जो मिट्टी रहित वातावरण में पनपते हैं और भरपूर पैदावार सुनिश्चित करते हैं।
सलाद, स्ट्रॉबेरी, खीरा,पालक, बीन, शिमला मिर्च, टमाटर, अंगूर इत्यादि।

हाइड्रोपोनिक्स के लाभ-

1. यह भूमिहीन कृषको तथा डुबने सीमित जल वाले क्षेत्रो में कृषि का विकल्प प्रदान करता है।

2. शहरी क्षेत्रो में जहाँ मृदा प्रदुषित होती है वहां हाइड्रोपोनिक्स का महत्व और बढ़ जाता है।

3. इस विधि में सीमित संसाधनो के उपयोग से भी खेती की जा सकती है।

4. इस विधि में पारंम्परिक खेती से 20-25 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।

एरोपोनिक्स
इस विधी में पौधो की जड़े हवा में लटकी रहती है और इसकी जड़ो पर पानी और पोषक तत्वो का छिड़काव किया जाता है। इस विधी में ग्रोइंग मीडिया तथा बहता जल प्रवाह दोनो ही अनुपस्थित रहते है, पौधे की वृद्वि आर्द्र वातावरण में होती है।

इस विधि के लाभ
1. इस विधि में पारंम्परिक विधी से 98 प्रतिशत जल तथा 60 प्रतिशत उर्वरक का बचत होता है, इस विधि से कीट इत्यादि का प्रकोप भी कम होता है, अतः इसमें कीटनाशको का प्रयोग नही किया जाता हैै।

2. एरोपोनिक्स विधि से उगाये गये पौधे में 3 गुनी अधिक तीव्र गति से वृद्वि होती है।

एक्वापोनिक्स
इस प्रकिया के मुख्यतः 3 घटक होते हैै, मछलिया, पौधे तथा बैक्टेरिया। इस प्रणाली में मछली तथा पौधे दोनों सह संबंध में होते है। मछलियों के मल का उपयोग पौधो द्वारा उर्वरक के रुप में किया जाता है तथा पौधेे गन्धे पानी को साफ करते है।

इस विधि के लाभ
1. यह प्रणाली पूर्णतः जैविक होती है, इस विधि में उर्वरक, रसायन तथा कीटनाशको का उपयोग नहीं किया जाता है।

2. इस प्रणाली को छोटे तथा बड़े दोना पैमाने में किया जा सकता है, इस विधि को एक एक्वैरियम से लेकर ग्रीन हाऊस तक में भी उपयोग किया जा सकता है।

3. यह प्रणाली पर्यावरण के लिए उपयुक्त है।

मिट्टी रहित खेती की आवश्यकता
बढ़ती जनसंख्या के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में कारगर साबित हो सकता है। COVID-19 महामारी और बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती खाद्य मांगों को पूरा करने एवं वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये वर्ष 2050 तक खाद्य उत्पादन में 60 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिये। पारंपरिक खेती के लिये संसाधनों की कमी, दुनियाभर में तेजी से बढ़ते शहरी करण के कारण कृषि के लिये उपयुक्त प्राकृतिक संसाधन, अर्थात् कृषि योग्य भूमि और जल में कमी आ रही है। बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिये न केवल मौजूदा कृषि योग्य भूमि में खाद्य फसलों की उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता है, बल्कि वैकल्पिक कृषि तकनीकों को प्रोत्साहित करने की भी आवश्यकता है।